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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ १६१/१६४*
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दुनियां दीजै दुनी कों, हमकूँ नांव निवास ।
बिरही टेरे रांम हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥१६१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि दुनिया चाहै संसारिक वस्तुऔ में द्वि गुणित ही लाभ कहे पर हमें तो हमारे प्रभु नाम में ही रहना है, विरही जीव तो राम राम व हे हरि ये ही पुकारते हैं।
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कहाँ घायल६ कहाँ बेदरद७, कहा अजान८ कहा जान९ ।
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि मंहि प्रांण समान ॥१६२॥
(६.घायल-आहत=क्षत) {७. बेदरद-स्वस्थ(वेदनारहित)}
(८. अजान-अज्ञानी) (९. जान-ज्ञानी)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु नाम से घायल जन को कहाँ घाव है व कहाँ नहीं है, कहाँ ज्ञान है व कहाँ वह ज्ञानी है, वे हरि भक्त इन बातों से मुक्त प्रभु भक्ति में मगन रहते हैं।
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कहि जगजीवन रांम रत, नांम न भूलै रांम ।
तेज पुंज मंहि मिल रहै, नूर पिवै सब ठांम ॥१६३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो राम में रत है वे जन प्रभु नाम नहीं भूलते। वे इतने प्रभुमय होगये हैं कि सर्वत्र ही प्रभुमय रहते हैं।
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दोजग१० भिस्त११ दुनी कहै, आसिक भिस्त अलाह ।
कहि जगजीवन ते लहैं, जिस अंदर जे चाह ॥१६४॥
{१०. दोजग-दोजख(नरक)} (११. भिस्त-बहिस्त=स्वर्ग)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि स्वर्ग नर्क दुनिया कहती है, प्रभु प्रेमियों को तो जहाँ उनके रब जी हैं वह ही स्वर्ग है। हर किसी को वह ही मिलता है जो वह चाहता है।
बिरही टेरे रांम हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥१६१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि दुनिया चाहै संसारिक वस्तुऔ में द्वि गुणित ही लाभ कहे पर हमें तो हमारे प्रभु नाम में ही रहना है, विरही जीव तो राम राम व हे हरि ये ही पुकारते हैं।
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कहाँ घायल६ कहाँ बेदरद७, कहा अजान८ कहा जान९ ।
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि मंहि प्रांण समान ॥१६२॥
(६.घायल-आहत=क्षत) {७. बेदरद-स्वस्थ(वेदनारहित)}
(८. अजान-अज्ञानी) (९. जान-ज्ञानी)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु नाम से घायल जन को कहाँ घाव है व कहाँ नहीं है, कहाँ ज्ञान है व कहाँ वह ज्ञानी है, वे हरि भक्त इन बातों से मुक्त प्रभु भक्ति में मगन रहते हैं।
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कहि जगजीवन रांम रत, नांम न भूलै रांम ।
तेज पुंज मंहि मिल रहै, नूर पिवै सब ठांम ॥१६३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो राम में रत है वे जन प्रभु नाम नहीं भूलते। वे इतने प्रभुमय होगये हैं कि सर्वत्र ही प्रभुमय रहते हैं।
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दोजग१० भिस्त११ दुनी कहै, आसिक भिस्त अलाह ।
कहि जगजीवन ते लहैं, जिस अंदर जे चाह ॥१६४॥
{१०. दोजग-दोजख(नरक)} (११. भिस्त-बहिस्त=स्वर्ग)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि स्वर्ग नर्क दुनिया कहती है, प्रभु प्रेमियों को तो जहाँ उनके रब जी हैं वह ही स्वर्ग है। हर किसी को वह ही मिलता है जो वह चाहता है।
(क्रमशः)

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