शुक्रवार, 29 मई 2020

*१५२. गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे*

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*दादू चंदन बावना, बसै बटाऊ आइ ।*
*सुखदाई शीतल किये, तीनों ताप नसाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निगुणा का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१५२. गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे*
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अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।
तीव्रेण भक्ति योगेन यजेत पुरुषं परम् ॥[१]
([१] चाहे तो निष्कामभाव से, चाहे सम्पूर्ण सांसारिक सुखों की इच्छा से अथवा मोक्ष की ही इच्छा से बुद्धिमान पुरुष को सर्वदा तीव्र भक्तियोग से उन परम पुरुष श्रीकृष्ण की नामस्मरण, संकीर्तन और लीला-कथारूपी यज्ञों द्वारा आराधना करते रहना चाहिये। श्रीमद्भा. २/३/१०)
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पाठकवृन्द राय रामानन्द जी के पिता राजा भवानन्द जी को तो भूले ही न होंगे। उनके राय रामानन्द, गोपीनाथ पट्टनायक और वाणीनाथ आदि पाँच पुत्र थे, जिन्हें प्रभु पाँच पाण्डवों की उपमा दिया करते थे और भवानन्द जी का पाण्डु कहकर सम्मान और सत्कार किया करते थे। वाणीनाथ तो सदा प्रभु की सेवा में रहते थे।
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राय रामानन्द पहले विद्यानगर के शासक थे, पीछे से उस काम को छोड़कर वे सदा पुरी में ही प्रभु के पादपद्मों के सन्निकट निवास किया करते थे और महाप्रभु को निरन्तर श्रीकृष्ण-कथा-श्रवण कराते रहते। उनके छोटे भाई गोपीनाथ पट्टनायक ‘माल जाठ्या दण्डपाट’ नामक उड़ीसा राज्यान्तर्गत एक प्रान्त के शासक थे।
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ये बड़े शौकीन थे, इनका रहन सहन, ठाट बाट, सब राजसी ढंग का ही था। धन पारक जिस प्रकार प्रायः लोग विषयी बन जाते हैं, उसी प्रकार के ये विषयी बने हुए थे। विषयी लोगों की इच्छा सर्वभुक अग्नि के समान होती है, उसमें धनरूपी ईंधन कितना भी क्यों न डाल दिया जाय उसकरी तृप्ति नहीं होती। तभी तो विषयी पुरुषों को शास्त्रकारों ने अविश्वासी कहा है।
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विषयी लोगों के वचनों का कभी विश्वास न करना चाहिये। उनके पास कोई धरोहर की चीज रखकर फिर उसे प्राप्त करने की आशा व्यर्थ है। विषय होता ही तब है जब हृदय में अविवेक होता है और अविवेक में अपने-पराये या हानि-लाभ का ध्यान नहीं रहता। इसलिये विषयी पुरुष अपने को तो आपत्ति के जाल में फंसाता ही है, साथ ही अपने संसर्गियों को भी सदा क्लेश पहुँचाता रहता है।
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विषयियों का संसर्ग होने से किसे क्लेश नहीं हुआ है। इसीलिये नीतिकारों ने कहा है -
दुर्वतसंगातिरनर्थपरम्पाराया हेतू:
सतां भावति किं वचनीयमत्र।
लंकेश्वरो हरति दाशरथे: कलत्रं
प्राप्नोति बंधनमसौ किल सिंधुराज:॥
‘इसमें विशेष कहने सुनने की बात ही क्या है ? यह तो सनातन की रीति चली आयी है कि विषयी पुरुषों से संसर्ग रचाने से अच्छे पुरुषों को भी क्लेश होता ही है। देखो, उस विषयी रावण ने तो जनकनन्दिनी सीता जी का हरण किया और बन्धन में पड़ा बेचारा समुद्र।’ साथियों के दुःख सुख का उपभोग सभी को करना होता है। वह सम्बन्धी नहीं जो सुख में सम्मिलित रहता है और दुःख में दूर हो जाता है। किन्तु एक बात है, यदि खोटे पुरुषों का सौभाग्यवश किसी महापुरुष से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध हो जाता है तो उसके इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं।
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साधु पुरुष तो सदा विषयी पुरुषों से दूर ही रहते हैं, किन्तु विषयी किसी भी प्रकार से उनके शरणापन्न हो जाय, तो फिर उसका बेड़ा पार ही समझना चाहिये। महापुरुषों को यदि किसी के दुःख को देखकर दुःख भी होता है तो फिर वह उस दुःख से छूट ही जाता है, जब संसारी दुःख महापुरुषों की तनिक सी इच्छा से छूट जाते हैं, तब शुद्ध हृदय से और श्रद्धाभक्ति पूर्वक जो उसकी शरण में जाता है उसका कल्याण तो होगा ही- इसमें कहना ही क्या?
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राजा भवानन्द जी शुद्ध हृदय से प्रभु के भक्त थे। उनके पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक महान विषयी थे। पिता का महाप्रभु के साथ सम्बन्ध था। इसी सम्बंध से उनका प्रभु के साथ थोड़ा-बहुत सम्बन्ध था। इस सम्बन्धी के सम्बन्ध संसर्ग के ही कारण वे सूली पर चढ़े हुए भी बच गये। महापुरुषों की महिमा ऐसी ही है।
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गोपीनाथ एक प्रदेश के शासक थे। सम्पूर्ण प्रान्त की आय उन्हीं के पास आती थी। वे उसमें से अपना नियत वेतन रखकर शेष रुपयों को राजदरबार में भेज देते थे। किन्तु विषयियों में इतना संयम कहाँ कि वे दूसरे के द्रव्य की परवा करें। हम बता ही चुके हैं कि अविवेक के कारण विषयी पुरुषों को बपने पराये का ज्ञान नहीं रहता।
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गोपीनाथ पट्टनायक भी राजकोष में भेजने वाले द्रव्य को अपने ही खर्च में व्यय कर देते। इस प्रकार उड़ीसा के महाराज के दो लाख रूपये उनकी ओर हो गये। महाराज ने इनसे अपने रुपये माँगे, किन्तु इनके पास रुपये कहाँ? उन्हें तो वेश्या और कलारों ने अपना बना लिया।
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गोपीनाथ ने महाराज से प्रार्थना की कि ‘मेरे पास नकद रुपये तो हैं नहीं। मेरे पास दस बीस घोड़े हैं कुछ और भी सामान है, इसे जितने में समझें ले लें, शेष रुपये मैं धीरे-धीेरे देता रहूँगा।’ महाराज ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और घोड़ों की कीमत निश्चय करने के निमित्त अपने एक लड़के को भेजा।
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वह राजकुमार बड़ा बुद्धिमान था, उसे घोड़ों की खूब परख थी, वह अपने दस-बीस नौकरों के साथ घोड़े की कीमत निश्चय करने वहाँ गया। राजकुमार का स्वभाव था कि वह ऊपर को सिर करके बार-बार इधर-उधर मुँह फिरा फिराकर बातें किया करता था।
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राजपुत्र था, उसे अपने राजपाट और अधिकार का अभिमान था, इसलिये कोई उसके सामने बोलता तक नहीं था। उसने चारों ओर घोड़ों को देख-भालकर मूल्य निश्चय करना आरम्भ किया। जिन्हें गोपीनाथ दो चार हजार के मूल्य का समझते थे, उनका उसने बहुत ही थोड़ा मूल्य बताया।
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महाराज गोपीनाथ को भवानन्द जी के सम्बन्ध से पुत्र की भाँति मानते थे, इसलिये वे बड़े ढ़ीठ हो गये थे। राजपुत्रों को वे कुछ समझते ही नहीं थे। जब राजपुत्र ने दो चार घोड़ों का ही इतना कम मूल्य लगाया तब गोपीनाथ से न रहा गया। उन्होंने कहा- ‘श्रीमान ! यह तो आप बहुत ही कम मूल्य लगा रहे हैं।’
(क्रमशः)

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