शनिवार, 2 मई 2020

माया का अंग ९८/१००

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*चार पदार्थ मुक्ति बापुरी, अठ सिधि नव निधि चेरी ।*
*माया दासी ताके आगे, जहँ भक्ति निरंजन तेरी ॥९८॥*
*दादू कहै ज्यों आवै, त्यों जाइ बिचारी ।*
*विलसी, वितड़ी, न माथै मारी ॥९८१/२॥*
जहां पर परब्रह्म परमात्मा की भक्ति रहती है वहां पर भक्ति की सेवा के लिये अष्टसिद्धि नवनिधि चारों प्रकार की मुक्तियाँ सेवा करने के लिये प्रयत्नशील रहती है । अतः मुक्ति की अपेक्षा भक्ति श्रेष्ठ मानी गई है । ज्ञानियों ने तो पहले ही मिथ्या मानकर उसका त्याग कर दिया । अतः उन्होंने न तो उसको विलसा क्योंकि उन्होंने उसको त्याग दिया और न उसको बांट(धन में) दिया क्योंकि उनके पास माया का अत्यन्त अभाव है किन्तु उन्होंने उसको त्याग दिया । किसी ने कहा है कि-
अरी तू कौन है ! उत्तर- मैं माताजी मुक्ति हूं ।
तो फिर तेरे अकस्मात् यहां आने का क्या प्रयोजन है ।
आप भगवान् श्रीकृष्ण का सतत् स्मरण करती हैं अतः मैं आपकी दासी बनने के लिये आई हूँ ।
अरी मुक्ति ! तू दूर ही खड़ी रह, यहां आने की तुम्हारी आवश्यकता नहीं है । 
मैंने तेरा कोई अपराध तो नहीं किया । फिर भी तुम ऐसा अनर्थ क्यों कर रही हो ।
मैंने भगवान् के नाम रूपी चन्दन का लेप कर रखा है वह तेरे गंधमात्र से नष्ट हो जायेगा । अतः दूर भाग जा । 
मोक्ष तो नीम के फल की तरह कटु है । अर्थात् उसके प्राप्त होने में अति कठिनाई है । अतः उस रस से जो अभिज्ञ है वह भले ही उस रस का पान करे । हम तो भक्ति रस के तत्त्व को जानते हैं । अतः गोपों की स्त्रियों के नेत्रांजलि से पिया हुआ श्यामामृत है । जो कामदेव से भी सुन्दर हैं उस रस का पान करते हैं । 
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*दादू माया सब गहले किये, चौरासी लख जीव ।*
*ताका चेरी क्या करै, जे रंग राते पीव ॥९९॥*
भगवान् के भक्त माया के प्रभाव से प्रभावित नहीं होते । क्योंकि माया उनकी दासी है । अन्य सभी प्राणी माया के बन्धन में पड़े हुए संसार में आते जाते रहते हैं ।
भागवत में कहा है कि- हे माधव ! आपके दास आपके प्रेम से बंधे हुए होने के कारण आपसे सुरक्षित होते हुए विघ्नों के सिर पर पैर रखकर निर्भय विचरते रहते हैं और भक्तिमार्ग से कभी भ्रष्ट नहीं होते । 
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*॥ विरक्तता ॥*
*दादू माया बैरिण जीव की, जनि कोइ लावे प्रीति ।*
*माया देखे नरक कर, यह संतन की रीति ॥१००॥*
यह माया प्राणियों की वैरिणी है । किसी को भी इससे स्नेह नहीं करना चाहिये । यह माया दर्शन मात्र से मनुष्य को नरक में डाल देती है । ऐसा सन्त अपने अनुभव से कहते हैं । फिर भी प्राणी जरा सा भी विचार नहीं करते । 
भागवत में लिखा है कि- हे भगवन् ! प्रायः सभी मनुष्य इस बात को जानते हैं कि विषय वासना विपत्ति का घर है फिर भी वे कुत्तों गधों और बकरों के समान दुःख सहन करके भी उन्हीं को भोगते रहते हैं इसका क्या कारण है?
(क्रमशः)

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