शनिवार, 2 मई 2020

*ईश्वरलाभ के उपरान्त कामिनी की मातृभाव से पूजा*

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*गुरु उपदेश देहु कर दीपक, तिमिर मिटे सब सूझे ।*
*दादू सोई पंडित ज्ञाता, राम मिलन की बूझे ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १९३)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*ईश्वरलाभ के उपरान्त कामिनी की मातृभाव से पूजा* 
“यदि एक बार उस प्रकार के तीव्र वैराग्य से भगवान् मिल जाएँ तो फिर स्त्रियों के प्रति आसक्ति नहीं रह जाती । घर में रहने से भी स्त्री की लालसा नहीं होती, फिर उससे कोई भय नहीं रहता । यदि एक चुम्बक-पत्थर बड़ा हो और एक छोटा, तो लोहे को कौन खींच सकता है? बड़ा ही खींच सकता है । ईश्वर बड़ा चुम्बक-पत्थर है और कामिनी छोटा चुम्बक-पत्थर है । तो भला कामिनी क्या कर सकेगी?”
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एक भक्त-महाराज, स्त्रियों से घृणा करें ?
श्रीरामकृष्ण-जिन्होंने ईश्वरलाभ कर लिया है, स्त्रियों को ऐसी दृष्टि से नहीं देखते, जिससे भय हो । वे यथार्थ देखते हैं कि स्त्रियों में ब्रह्मयी माता का अंश है; और उन्हें माता जानकर उनकी पूजा करते हैं । (विजय से) तुम कभी कभी आया करो, तुम्हें देखने की बड़ी इच्छा होती है ।
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(५)
*ईश्वरादेश प्राप्त होने के बाद आचार्य-पद* 
विजय- ब्राह्म समाज का काम करना पड़ता है, इसलिए हर समय नहीं आ सकता अवकाश मिलने पर आऊँगा ।
श्रीरामकृष्ण- देखो, आचार्य का काम बड़ा कठिन है । ईश्वर का प्रत्यक्ष आदेश पाए बिना लोकशिक्षा नहीं दी जा सकती ।
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“यदि आदेश पाए बिना ही उपदेश दिया जाय तो लोग उस ओर ध्यान नहीं देते, उस उपदेश में कोई शक्ति नहीं रहती । पहले साधना करके या जिस तरह हो, ईश्वर को प्राप्त करना चाहिए । उनकी आज्ञा मिलने पर फिर लेक्चर दिया जा सकता है ! उस देश में ‘हालदारपुकुर’ नाम का एक तालाब है । उसके बाँध पर लोग पाखाना किया करते थे । जो लोग घाट पर आते थे, वे उन्हें खूब गालियाँ देते थे, खूब गुल-गपाड़ा मचाते थे, परन्तु गालियों से कोई काम न होता था । दूसरे दिन फिर वही हालात होती थी । अन्त को कम्पनी के चपरासी नोटिस लटका गए कि यहाँ शौच के लिए जाने की सख्त मनाही है; न माननेवाले को सजा दी जाएगी । इस नोटिस के बाद फिर वहाँ कोई शौच के लिए नहीं जाता था ।
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“उनके आदेश के बाद कहीं भी आचार्य हुआ जा सकता है और लेक्चर भी दिया जा सकता है । जिसको उनका आदेश मिलता है, उसे उनकी शक्ति भी मिलती है; तब वह आचार्य का कठिन काम कर सकता है ।
“एक बड़े जमींदार से उसकी एक प्रजा मुकदमा लड़ रही थी । तब लोग समझ गए कि उस प्रजा के पीछे कोई जोरदार आदमी है; सम्भव है कि कोई बड़ा जमींदार ही उसकी ओर से मुकदमा चला रहा हो । मनुष्य साधारण जीव है, ईश्वर की शक्ति के बिना आचार्य जैसा कठिन काम वह नहीं कर सकता ।”
(क्रमशः)

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