रविवार, 24 मई 2020

*प्रभात में भक्तों के साथ*

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*परम तेज प्रगट भया, तहाँ मन रह्या समाइ ।* 
*दादू खेलै पीव सौं, नहीं आवै नहीं जाइ ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)* 
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 

साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
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*परिच्छेद २६*
*दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का जन्मोत्सव*
(१)
*प्रभात में भक्तों के साथ*
कालीमन्दिर में आज श्रीरामकृष्ण का जन्मोत्सव है । फाल्गुन की शुक्ल द्वितीय है, दिन रविवार, ११ मार्च १८८३ ई. । आज श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त उन्हें लेकर जन्मोत्सव मनायेंगे ।
सबेरे से भक्त एक एक करके एकत्र हो रहे हैं । सामने माता भवतारिणी का मन्दिर है । मंगलारती के बाद ही प्रभाती रागिणी में मधुर तान लगाती हुई नौबत बज रही है । वसन्त का सुहावना मौसम है, लता-वृक्ष नये कोमल पल्लवों से लहराते हुए दीख पड़ते हैं । इधर श्रीरामकृष्ण के जन्मदिन की याद करके भक्तों के हृदय में आनन्द-सिन्धु उमड़ रहा है । चारों और आनन्द-समीरण बह रहा है । मास्टर ने देखा, इतने सबेरे ही भवनाथ, राखाल, भवनाथ के मित्र कालीकृष्ण आ गये हैं । 
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श्रीरामकृष्ण पूर्ववाले बरामदे में बैठे हुए इनसे प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं । मास्टर ने श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया । 
श्रीरामकृष्ण(मास्टर से)- “तुम आये हो ! (भक्तों से) लज्जा, घृणा, भय इन तीनों के रहते काम सिद्ध नहीं होता । आज कितना आनन्द होगा ! परन्तु जो लोग भगवन्नाम में मत्त होकर नृत्य-गीत न कर सकेंगे, उनका कहीं कुछ न होगा । ईश्वरी चर्चा में कैसी लज्जा और कैसा भय? अच्छा, अब तुम लोग गाओ ।”
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भवनाथ और कालीकृष्ण गा रहे हैं । गीत इस आशय का है :
“हे आनन्दमय ! आज का दिन धन्य है ! हम सब तुम्हरे सत्य-धर्म का भारत में प्रचार करेंगे । हरएक हृदय में तुम्हीं विराजित हो, चारों ओर तुम्हारे ही पवित्र नाम की ध्वनि गूँजती है, भक्त-समाज तुम्हारी स्तुति करते हैं । हे प्रभो, हमें धन, जन और मान न चाहिए, दूसरी कामना भी नहीं है, विकल जन तुम्हारी प्रार्थना कर रहे हैं । हे प्रभो, तुम्हारे चरणों के शरण ली तो फिर न विपत्ति में भय है, न मृत्यु में; मुझे तो अमृत मिल गया । तुम्हारी जय हो !”
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हाथ जोड़कर बैठे हुए मन लगाकर श्रीरामकृष्ण गाना सुन रहे हैं । गाना सुनते सुनते आपका मन सीधे भावराज्य में पहुँच गया है । श्रीरामकृष्ण का मन सूखी दियासलाई है । एक बार घिसने से उद्दीपना होती है । प्राकृत मनुष्यों का मन भीगी दियासलाई है, कितनी ही घिसो पर जलती नहीं, क्योंकि वह विषयासक्त है । श्रीरामकृष्ण बड़ी देर तक ध्यान में लगे हुए हैं । कुछ देर बाद कालीकृष्ण भवनाथ से कुछ कह रहे हैं ।
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*पहले हरिनाम या मजदूरों की शिक्षा*
कालीकृष्ण श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके उठे । श्रीरामकृष्ण ने विस्मित होकर पूछा, “कहाँ जाओगे?”
भवनाथ- कुछ काम है, इसीलिए वे जा रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण- क्या काम है?
भवनाथ- श्रमजीवियों के शिक्षालय में(Baranagore Workingmen’s Institute) जा रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण- भाग्य ही में नहीं है । आज हरिनाम-कीर्तन में कितना आनंद होता है, देखा नहीं । उसके भाग्य ही में नहीं था ।
(क्रमशः)

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