रविवार, 24 मई 2020

साच का अंग १८/२२

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*दादू भीतर द्वन्दर भर रहे, तिनको मारैं नांहि ।*
*साहिब की अरवाह को, ताको मारन जांहि ॥१८॥*
*दादू मूये को क्या मारिये, मीयां मूई मार ।*
*आपस को मारै नहीं, औरों को हुसियार ॥१९॥*
आश्चर्य है कि अपने मन में जो कामक्रोध आदि शत्रु रहते हैं उनको न मार कर निरपराध प्राणियों को मारते हैं । हे मुसलमानो ! जो अपने कर्म से पहले ही मरे हुए हैं अतएव मृत तुल्य उन प्राणियों को क्यों मारते हो । ये मारने के योग्य नहीं है । किन्तु तुम्हारी कृपा के पात्र हैं अतः इन सब पर दया करो । क्योंकि दया धर्म सबसे बड़ा धर्म है ।
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*॥ साच ॥*
*जिसका था तिसका हुआ, तो काहे का दोष ।*
*दादू बंदा बंदगी, मीयां ना कर रोष ॥२०॥*
*सेवक सिरजनहार का, साहिब का बंदा ।*
*दादू सेवा बंदगी, दूजा क्या धंधा ॥२१॥*
इन साखियों में श्री दादूजी महाराज मुसलमानों को उपदेश कर रहे हैं । मुसलमानों के धर्म में ज्ञान से मोक्ष नहीं मानते इसके लिये वे विवाद करते हैं । संत श्री दादूजी कहते हैं कि हे यवनों ! यदि कोई ज्ञानमार्ग से चल कर ब्रह्म को प्राप्त करता हैं अथवा कोई साधक भक्ति मार्ग से चल कर ईश्वर को प्राप्त होता है तो आप लोग क्यों विवाद करते हैं, क्यों क्रोध करते हैं । ये दोनों मार्ग ठीक हैं । किंच जो सच्चा सेवक है वह अन्तर्मुख वृत्ति से भगवान् को प्राप्त करता है । वह बाह्य आडम्बर नहीं करता, जैसा आप लोग करते हो । अतः तुम भी बाह्य आडम्बर को छोड़कर प्रभु का ध्यान करो ।
(क्रमशः)

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