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*जहँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि ।*
*दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु*, *मातृ भक्ति*
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बंगाल के कविवर रामप्रसाद सेन मातृभाव के भक्त थे । एक दिन वे अपनी कुटिया के लिये एक बेड़ा(टटिया) बाँधने लगे । उसकी सहायता के लिये मां उमा को(अपनी लड़की को) मां उमा, मां उमा कह कर पुकारा किन्तु मां उमा उस समय वहां नहीं थी, अपनी सखियों के घर गई हुई थी । रामप्रसाद को यह पता नहीं था । वे दो चार बार पुकार कर के अपने कार्य में लग गये ।
उन्होंने इस पार से डोरी दिया किन्तु उस और से भी डोरी आनी चाहिये । नहीं तो बेड़ा कैसे बंधे । यह देखकर भगवती अपने भक्त की सहायता के लिये स्वयं आकर डोरी देने लगी । फिर तो क्या था बड़ा सुन्दर बेड़ा तैयार हो गया । बेड़ा बांधकर भगवतीजी अन्तर्धान हो गई ।
कुछ देर बाद उनकी पुत्री मां उमा आई और बेड़े को देखकर बोली - "बाबा ! बेड़ा तो बहुत अच्छा बांधा । पर अकेले कैसे बांधा ? रामप्रसाद - बेटी, तेरी मदद के बिना कैसे बांधता, तू ने ही बंधाया है । कन्या - "बाबा ! मैं तो यहाँ थी ही नहीं, कुछ देर विवाद होने पर अन्त में रामप्रसाद ने ध्यान धर के देखा तो ज्ञात हुआ कि बेड़ा तो भगवतीजी ने बंधाया है । इससे सूचित होता है कि मातृभाव के भक्त की रक्षा भगवान माता के रूप में ही आकर करते है ।
मातृभाव के भक्त की, भगवत करत सहाय ।
टटिया रामप्रसाद की, दीन्ही भले बँधाय ॥२६९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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