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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ १६९/१७२*
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हड्डियाँ हरि मंहि गली, बिरह जगायां जोग ।
कहि जगजीवन रांम भगति करि, भूले षट रस भोग१ ॥१६९॥
{१. षट रस भोग-छह रस वाला भोजन । जैसे- १. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. कटु, ५. कषाय(कसैला) एवं ६. तिक्त(मिर्च) । यदि इन छहों रसों को भोजन में यथावसर उचित मात्रा में प्रयुक्त किया जाय तो भोजन स्वादिष्ट हो जाता है ।}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु प्रेम में हड्डियां गल गयी हैं विरह कारण वैराग्य हो गया है । राम भक्ति की लै लगने से सभी छः प्रकार के रस क्षीण होकर फीके लगने लगे हैं।
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तुरकी सिकम दरद बीमार तन, लागर आसिकां लीन ।
कहि जगजीवन आब२ थैं, बिछुरत मरै सु मीन ॥१७०॥
{२. आब-आप(जल)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि देह माटी के कण सी होगयी है ।कोइ मूल्य नहीं रहा प्रभु भक्तों की देह दर्द से दुखी ह ऐसे प्रतीत होता है मानो जल से मछली अलग हो गयी हो सादर सत्यराम जी।
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*मूं मूं चश्म३ खुदाइ दे, खुदाइ दिखावै आप ।
कहि जगजीवन रहम करि, दूरि करै तन ताप ॥१७१॥
(*विशेष : साषी सं० १७१ से साषी सं० २०१ तक का पाठ मूल पाण्डुलिपि में बहुत ही अस्पष्ट था । इन की भाषा भी फारसी है । अतः विवश हो कर हम यथोपलब्ध मूल पाठ दे कर केवल क्रमभंग दोष से मुक्त हो कर सन्तोष मान रहे हैं ।-सं०)
{३. चश्म-चक्षु(=नेत्र)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अतंर में जो ज्ञान चक्षु हैं वे परमात्मा के हैं, जिनके द्वारा वे अपना ब्रह्मांड दिखाते हैं, और कृपा करके हमारे सारे पाप ताप दूर करते हैं।
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आसिक अलह नांम ले, दिल मंहि तमै न तांम ।
कहि जगजीवन कीन्हां अंत, दांन चाह तजि दांम ॥१७२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि, प्रभु के बंदे जब उनका नाम लेते हैं और उन्हें आत्मरुप में नहीं ध्याते, तब वह नाम लेना सब समाप्त हो जाता है फलित नहीं होता । जैसे सिर्फ अमूर्त दान, जो केवल कहते रहते हैं और देते नहीं ।
(क्रमशः)

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