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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*साच अमर जुग जुग रहै, दादू विरला कोइ ।*
*झूठ बहुत संसार में, उत्पत्ति परलै होइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*साँच निर्भय का अंग ११८*
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साँच बोले इन्द्र ज्यों, सब वाणी शिरताज ।
रज्जब छल बल शब्द का, ता१ शिर करै न राज ॥२१॥
सत्य शब्द इन्द्र की गर्जना के समान बोला जाता है, वह सभी वाणियों का शिरोमणी होता है, और जिसका छल ही बल है, वह मिथ्या शब्द उस१ सत्य शब्द पर राज नहीं कर सकता अर्थात शोभा नहीं पाता ।
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सत्य शब्द के शीश पर, झूठ न पावै ठौर ।
रज्जब शशि सोलह कला, ता पर चढै न और ॥२२॥
चन्द्रमा सोलह कला का होता है, उस पर और कला नहीं चढ सकती है, वैसे ही सत्य शब्द के शिर पर मिथ्या शब्द स्थान नहीं प्राप्त कर सकता ।
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अधिक अठारह सौ नहीं, पासौ मांहीं डाव ।
तैसे रज्जब साँच शिर, झूठ न चढै चढाव ॥२३॥
पासों में अठारह से अधिक दांव की संख्या नहीं होती, वैसे ही सत्य-शब्द के ऊपर झूठ चढाने से भी नहीं चढता, अर्थात झूठ सत्य पर विजय नहीं पाता ।
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जन रज्जब नाणाँ१ खरा२, माने नौ खण्ड माँहि ।
खोटे को डालै खलक३, या में निन्दा नांहि ॥२४॥
सच्चे१ सिक्के२ को पृथ्वी के नोऔं खण्डों में मानते हैं और खोटे को संसार३ के प्राणी पटक देते हैं । इसमें निन्दा की बात नहीं है, यह तो सत्य का समादर है ।
(क्रमशः)

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