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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग टोडी(तोडी) १६ (गायन समय दिन ६ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२८३ - आत्म समता । उत्सव ताल
ऐसे बाबा राम रमीजै,
आतम सौं अंतर नहिं कीजे ॥टेक॥
जैसे आतम आपा लेखै,
जीव जन्तु ऐसे कर पेखै ॥१॥
एक राम ऐसे कर जानैं,
आपा पर अंतर नहिं आनैं ॥२॥
सब घट आत्म एक विचारै,
राम सनेही प्राण हमारै ॥३॥
दादू सांची राम सगाई,
ऐसा भाव हमारे भाई ॥४॥
सब में सम - भाव से बर्ताव करते हुये भजन करने की प्रेरणा कर रहे हैं, हे बाबा ! ऐसा अभेद ज्ञान युक्त राम में राम का चिन्तन रूप रमण करना चाहिये ।
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जिससे किसी भी आत्मा से भेद व्यवहार न किया जाय । जैसे अपनी आत्मा को देखे । वैसे ही अपनी आत्मा समझ कर सभी जीव - जन्तुओं को देखना चाहिये ।
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विचार करके जाने - सब में एक ही राम स्थित है, अपने पराये का भेद हृदय में न आने दे
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तथा ऐसा विचार करे कि - सभी शरीरों में आत्मा एक ही है और राम हम सबका ही प्राण स्नेही है ।
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हे भाई ! हमारे हृदय में तो ऐसा ही भाव है कि - आत्माराम से सम्बन्ध होना ही सच्चा सम्बन्ध है । शरीरादि का भेद युक्त सम्बन्ध मिथ्या है ।
(क्रमशः)

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