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*परिचय का पय प्रेम रस, जे कोई पीवै ।*
*मतवाला माता रहै, यों दादू जीवै ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(४)
*कीर्तन का आनन्द तथा समाधि*
भक्त निर्वाक् होकर वह अवतार-तत्त्व सुन रहे हैं । कोई कोई सोच रहे हैं, ‘क्या आश्चर्य है ! वेदान्त अखण्ड सच्चिदानन्द-जिन्हें वेद ने मन-वचन से परे बताया है- क्या वे ही हमारे साढ़े-तीन हाथ का मनुष्य-शरीर लेकर आते हैं? जब श्रीरामकृष्ण कहते हैं तो वैसा अवश्य ही होगा । यदि ऐसा न होता तो ‘राम राम’ कहते हुए इन महापुरुष को क्यों समाधि होती? अवश्य इन्होंने हृदयकमल में राम का रूप देखा होगा ।’
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थोड़ी देर में कोन्नगर से कुछ भक्त मृदंग और झाँझ लिए संकीर्तन करते हुए बगीचे में आए । मनमोहन, नबाई आदि बहुत से लोग नामसंकीर्तन करते हुए श्रीरामकृष्ण के पास उसी उत्तरपूर्ववाले बरामदे में पहुँचे । श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त होकर उनसे मिलकर संकीर्तन कर रहे हैं ।
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नाचते नाचते बीच बीच में समाधि हो जाती है । तब संकीर्तन के बीच में निःस्पन्द होकर खड़े रहते हैं । उसी अवस्था में भक्तों ने उनको फूलों की बड़ी बड़ी मालाओं से सजाया । भक्त देख रहे हैं मानो सामने ही श्रीगौरांग खड़े हैं । गहरी भावसमाधि में मग्न हैं । श्रीगौरांग की तरह श्रीरामकृष्ण की भी तीन दशाएं हैं; कभी अन्तर्दशा-तब जड़ वस्तु की भाँति आप बेहोश और निःस्पन्द हो जाते हैं; कभी अर्धबाह्य दशा-तब प्रेम से भरपूर होकर नाचते हैं; और फिर बाह्य दशा-तब भक्तों के साथ संकीर्तन करते हैं ।
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श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो खड़े हैं । गले में मालाएँ हैं । कहीं गिर न पड़े इसलिए एक भक्त आपको पकड़े हुए हैं । चारों ओर भक्त खड़े होकर मृदंग और झाँझ के साथ कीर्तन कर रहे हैं । श्रीरामकृष्ण की दृष्टि स्थिर है । श्रीमुख पर प्रेम की छटा झलक रही है । आप पश्चिम की ओर मुँह किए हैं । बड़ी देर तक सब लोग यह आनन्दमूर्ति देखते रहे ।
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समाधि छूटी । दिन चढ़ गया है । थोड़ी देर बाद कीर्तन भी बन्द हुआ । भक्तगण श्रीरामकृष्ण को भोजन कराने के लिए व्यग्र हैं ।
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कुछ देर विश्राम के पश्चात् श्रीरामकृष्ण एक नया पीला वस्त्र पहने अपनी छोटी खाट पर बैठे । आनन्दमय महापुरुष की उस अनुपम ज्योतिर्मय रूपछबि को भक्त देख रहे हैं; पर देखने की प्यास नहीं मिटती । वे सोचते हैं की इसे देखते ही रहें, इस रूपसागर में डूब जायें ।
श्रीरामकृष्ण भोजन करने बैठे । भक्तों ने भी प्रसाद पाया ।
(क्रमशः)

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