मंगलवार, 5 मई 2020

= *संयम कसौटी का अंग ११६(४१/४४)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*काटे ऊपर काटिये, दाधे को दौं लाइ ।*
*दादू नीर न सींचिये, तो तरुवर बधता जाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*संयम कसौटी का अंग ११६*
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सरबस१ दे सरबस लिया, साधू सांई अंग२ ।
रज्जब अज्जब काम में, बंदों३ बदल्या नंग ॥४१॥
संतों ने ईश्वर को सर्वस्व१ देकर ईश्वर से सर्वस्व लिया है, इस प्रकार संत ब्रह्म स्वरूप२ ही हो गये हैं इस अदभुत काम में संतों३ के नंग(न अंग) शरीर नहीं बदलता है, जो शरीर अज्ञानावस्था में था वही शांतावस्था में रहा है ।
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रज्जब अवसर काम सिर१, मरने मुलक२ बखान३ ।
ज्यों नक्षत्र४ निशि टूट तो, देखे सकल जहान५ ॥४२॥
समय पर किसी विशेष कार्य के लिये१ मरने से देश२ में उसकी ऐसी ख्याति होती है, जैसी रात्री में टूटने वाले तारे४ की, उसको सभी जगत्५ - ख्याति होती है, उसको सभी जगत् देखता है, वैसे ही उस व्यक्ति की कीर्ति सब में ही कही३ सुनी जाती है ।
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अवसर बिन की मींच गत, ज्यों दिन टूटा तार ।
रज्जब उभय अलोप लोप ह्वैं, दीसैं नहीं लगार१ ॥४३॥
बिना समय की मृत्यु दिन में टूटे हुये तारे के समान होती है, मरने वाला जीव और तारा दोनों अलोप होने पर भी लोप जाते हैं किंचित्१ मात्र भी नहीं दीखते ।
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सेवक सेवा संकट्या, सुंदरी सुत जावंत ।
रज्जब पीड़ा परम सुख, भृत१ भामनि२ भावंत३ ॥४४॥
सेवक सेवा रूप कष्ट सहन करता है, सुन्दरी पुत्र उत्पन्न करने रूप संकट सहन करती है, तब उक्त दोनों की पीड़ा सुख रूप हो जाती है, उक्त प्रकार का सेवक१ और नारी२ प्रिय३ ही लगते हैं ।
(क्रमशः)

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