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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ १७७/१८०*
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हरदम बुरौ बीमार तन, लागर१ भूल२ की लाइ३ ।
कहि जगजीवन दोस्ती, दिल मंहि देखै आइ ॥१७७॥
(१. लागर-दुर्बल) (२. भूल-प्रमाद) (३. लाइ-अग्नि)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि यह देह चाहे कितनी भी बुरी हो इसकी मानसिकता स्वस्थ न हो ये भगवन्नाम में दुर्बल हो प्रमाद यानि झूठी विकार युक्त मस्ती में रत हो संसारिक तापों से दग्ध हो फिर भी परमात्मा की कृपा रुपी मैत्री भव्य है कि वे दिल में रहते है।
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सुखन पाक सिरदम कदम, आसिक अल्लह जोइ ।
कहि जगजीवन जिस्त थैं, सुरती जेबा४ होइ ॥१७८॥
(४. जेबा-शोभाजनक)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो सुखदायी पवित्रता धारण कर प्रभु चरणों में रहते हैं वे ही सच्चे भक्त या आशिक हैं इससे उनकी यश कीर्ति व शोभा में वृद्धि होती है।
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सुखन पुखत औजूदयम, खुर्दक अल्लह लीन ।
कहि जगजीवन वीम दिल, पीर पिछांणै दीन ॥१७९।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि पक्का सुख परमात्मा के स्वरूप को जानने में ही है कि हम उसके औजूद यानि उपस्थिति को जान लें, व उसमें लीन रहें । जिसके प्रभु का ही आधार है वे अपने परमात्मा को सहज ही पहचान जाते हैं वे उन्हें कृपा में ही दृष्टिगोचर होते हैं। यह ही उनका धर्म है कि वे परमात्मा की कृपा जानें।
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तलख जुलाब जमीं मंही, तुष रोइद बिसियार ।
कहि जगजीवन फलक दर, नूर अलह लहै सार ॥१८०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि विसर्जन बार बार बहुत कठोर व तीव्र गति से धरा पर होता है उतनी ही सरलता से पुनर्जन्म का सिलसिला चलता है। यह जब परदा उठता है तो उस परमात्मा का तेज दिखाई देता है।
(क्रमशः)

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