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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग सारंग १५ (गायन समय मध्य दिन)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२६४. गुरु ज्ञान । सूरफख्ता ताल
हो ऐसा ज्ञान ध्यान, गुरु बिना क्यों पावै ।
वार पार, पार वार, दुस्तर तिर आवै हो ॥टेक॥
भवन गवन, गवन भवन, मन ही मन लावै ।
रवन छवन, छवन रवन, सतगुरु समझावै हो ॥१॥
क्षीर नीर, नीर क्षीर, प्रेम भक्ति भावै ।
प्राण कँवल विकस विकस, गोविन्द गुण गावै हो ॥२॥
ज्योति जुगति बाट घाट, लै समाधि ध्यावै ।
परम नूर परम तेज, दादू दिखलावै हो ॥३॥
सद्गुरु बिना यथार्थ ध्यान ज्ञान की दुर्लभता दिखाराहे हैं - हे भाई ! सद्गुरु बिना ऐसा ध्यान और ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है ? जिसके द्वारा साधक दुस्तर संसार के इस विषयासक्ति रूप तट से तैर कर निरासक्ति रूप अगले तट पर आ पहुंचे ।
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विषय-भवन में गमन करनेवाली मन की वृत्ति को मन ही मन में ध्यान तथ ज्ञान विचार करके परब्रह्म में लगा सके तथा वृत्ति भी सब विश्व के निवास स्थान ब्रह्म-भवन में गमन कर सके और स्थिर रहकर, विषयों में रमण करना छोड़ दे तथा स्थिरता पूर्वक ब्रह्म में ही रमण करे । ऐसा ध्यान तथा ज्ञान तो सद्गुरु ही समझा सकते हैं ।
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जैसे दूध में जल और जल में दूध एक हो जाता है, वैसे ही आत्मा परमात्मा में एक होने का निश्चय होने पर भी प्रेमा भक्ति प्रिय लगे तथा प्राणी का हृदय-कमल आनंद से बारंबार खिलता रहे और वह गोविन्द गुण-गान करता रहे ।
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योग युक्ति द्वारा ब्रह्म-ज्योति के साक्षात्कारार्थ अन्तर्मुख वृत्ति रूप मार्ग से समाधि-घाट पर पहुँचा सके तथा परम तेज रूप अपने परम स्वरुप को दिखा सके, ऐसा ध्यान-ज्ञान सद्गुरु बिना नहीं मिलाता ।
(क्रमशः)

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