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*जहँ दिनकर तहँ निशि नहीं,*
*निशि तहँ दिनकर नांहि ।*
*दादू एकै द्वै नहीं, साधुन के मत मांहि ॥*
===========================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*साँच निर्भय का अंग ११८*
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तार हु तोरा१ तब लगे, जब लग रवि न प्रकाश ।
रज्जब रती२ न रहि सके, देखि दिवाकर३ त्रास४ ॥१३॥
तारों का प्रकाश का जोर१ तब तक ही होता है जब तक सूर्य का प्रकाश नहीं होता, सूर्य३ को देखकर तो उनका प्रकाश भय४ से मंद पड़ जाता है, किंचित२ मात्र भी नहीं रहता, वैसे ही सत्य के आने पर असत्य का भय नहीं रहता ।
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साँच सूत सो काणि कट, साधु जन सुत धार ।
रज्जब काढें बंक बल, ता में फेर न सार ॥१४॥
सत्य तो सूत के समान है और वह झूठ काण काट के समान है, साधु सूत्र को धारण करने वाला है । जैसे सूत को सुधारने वाला उसका बाँकापन, बल, कंटक और कांण आदि सभी दोष निकाल देता है, वैसे ही सत्य के कांण आदि दोष संत निकाल देते हैं, यह यथार्थ है, इसमें परिवर्तन को अवकाश नहीं है ।
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साँच आरसी१ देव गति२, करै कौन की कान३ ।
कहि दिखलावे होय ज्यों, आपा पर सम जान ॥१५॥
सत्य दर्पण१ के समान देवताओं की सी चेष्टा२ वाला है जैसे दर्पण किसी की भी मान-मर्यादा३ नहीं करता, अपने पराये को समान जान कर जैसा कोई होता है, वैसा ही दिखा देता है वैसे ही सत्य सबमें सम है, जैसा हो वैसा ही कह देता है ।
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साधु शशिहर१ सूर के, आपा पर सम भाय ।
रज्जब रंग२ परगट करै, अपगुण३ देहिं दिखाय ॥१६॥
सच्चे संत, चन्द्रमा१ और सूर्य ये अपने पराये को समान भाव से ही देखते हैं, जैसे सूर्य चन्द्र को प्रकाश देकर दोषों को दिखा देता है, वैसे ही सच्चे संत हरि प्रेम२ प्रकट करके अवगुणों३ को दिखा देते हैं और निर्भय रहते हैं ।
(क्रमशः)
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*जहँ दिनकर तहँ निशि नहीं,*
*निशि तहँ दिनकर नांहि ।*
*दादू एकै द्वै नहीं, साधुन के मत मांहि ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*साँच निर्भय का अंग ११८*
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तार हु तोरा१ तब लगे, जब लग रवि न प्रकाश ।
रज्जब रती२ न रहि सके, देखि दिवाकर३ त्रास४ ॥१३॥
तारों का प्रकाश का जोर१ तब तक ही होता है जब तक सूर्य का प्रकाश नहीं होता, सूर्य३ को देखकर तो उनका प्रकाश भय४ से मंद पड़ जाता है, किंचित२ मात्र भी नहीं रहता, वैसे ही सत्य के आने पर असत्य का भय नहीं रहता ।
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साँच सूत सो काणि कट, साधु जन सुत धार ।
रज्जब काढें बंक बल, ता में फेर न सार ॥१४॥
सत्य तो सूत के समान है और वह झूठ काण काट के समान है, साधु सूत्र को धारण करने वाला है । जैसे सूत को सुधारने वाला उसका बाँकापन, बल, कंटक और कांण आदि सभी दोष निकाल देता है, वैसे ही सत्य के कांण आदि दोष संत निकाल देते हैं, यह यथार्थ है, इसमें परिवर्तन को अवकाश नहीं है ।
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साँच आरसी१ देव गति२, करै कौन की कान३ ।
कहि दिखलावे होय ज्यों, आपा पर सम जान ॥१५॥
सत्य दर्पण१ के समान देवताओं की सी चेष्टा२ वाला है जैसे दर्पण किसी की भी मान-मर्यादा३ नहीं करता, अपने पराये को समान जान कर जैसा कोई होता है, वैसा ही दिखा देता है वैसे ही सत्य सबमें सम है, जैसा हो वैसा ही कह देता है ।
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साधु शशिहर१ सूर के, आपा पर सम भाय ।
रज्जब रंग२ परगट करै, अपगुण३ देहिं दिखाय ॥१६॥
सच्चे संत, चन्द्रमा१ और सूर्य ये अपने पराये को समान भाव से ही देखते हैं, जैसे सूर्य चन्द्र को प्रकाश देकर दोषों को दिखा देता है, वैसे ही सच्चे संत हरि प्रेम२ प्रकट करके अवगुणों३ को दिखा देते हैं और निर्भय रहते हैं ।
(क्रमशः)

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