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*दादू यह तो दोजख देखिये, काम क्रोध अहंकार ।*
*रात दिवस जरबौ करै, आपा अग्नि विकार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ माया का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*नित्यगोपाल को उपदेश-त्यागी के लिए स्त्रीलिंग पूर्णतया निर्विघ्न*
खिलाने के बाद श्रीरामकृष्ण उनको गंगा की ओर कमरे के गोल बरामदे में ले गए और उनसे बातें करने लगे । एक परम भक्त महिला, जिनकी उम्र कोई इकतीस-बत्तीस वर्ष की होगी, श्रीरामकृष्ण के पास अक्सर आती हैं और उनकी बड़ी भक्ति करती हैं । वे भी इन भक्त की अद्भुत भावावस्था को देखकर इन्हें अपने लड़के के भाँति प्यार करती हैं और इन्हें प्रायः अपने घर लिवा ले जाती हैं ।
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श्रीरामकृष्ण(भक्त से)- क्या तू वहाँ जाता है?
नित्यगोपाल(बालक की तरह)- हाँ, जाता हूँ । मुझे लिवा ले जाती है ।
श्रीरामकृष्ण- अरे साधु सावधान एक-आध बार जाना, बस । ज्यादा मत जाना, नहीं तो गिर पड़ेगा ! कामिनी और कंचन ही माया है । साधु को स्त्रियों से बहुत दूर रहना चाहिए । वहाँ सब डूब जाते हैं । वहाँ ब्रह्मा और विष्णु तक लोटपोट हो जाते हैं । भक्त ने सब सुना ।
मास्टर(स्वगत)- क्या आश्चर्य की बात है ! इन भक्त की परमहंस की अवस्था है-यह तो आप स्वयं ही कहते हैं । इतनी उच्च अवस्था होते हुए भी इनके पतन की आशंका है ! साधुओ के लिए आपने क्या ही कठिन नियम बना दिये हैं ! स्त्रियों के साथ अधिक मिलने-जुलने से साधु का पतन होने की सम्भावना रहती है । यह उच्च आदर्श सामने न रहे तो भला जीवों का उद्धार कैसे हो? वह स्त्री तो भक्त ही है । फिर भी भय है ! अब समझा, श्रीचैतन्यदेव ने छोटे हरिदास को इतनी कठोर सजा क्यों दी थी । महाप्रभु के मना करने पर भी हरिदास ने एक भक्त विधवा से वार्तालाप किया था । परन्तु हरिदास संन्यासी थे । इसलिए महाप्रभु ने उन्हें त्याग दिया । कितनी कठोर सजा ! संन्यासी के लिए कितना कठिन नियम ! फिर इन भक्त पर आपका कितना प्रेम है ! आगे चलकर की विपत्ति न आ पड़े, इसलिए पहले ही से इन्हें सचेत कर रहे हैं । भक्तगण निःस्तब्ध होकर ‘साधु सावधान’ यह गम्भीर वाणी सुन रहे हैं ।
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*साकार-निराकार । श्रीरामकृष्ण की रामनाम में समाधि*
अब श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ अपने कमरे के उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में आ गए हैं । भक्तों में दक्षिणेश्वर के रहनेवाले एक गृहस्थ भी बैठे हैं; वे घर पर वेदान्त की चर्चा करते हैं । श्रीरामकृष्ण के सामने वे केदार चटर्जी से शब्दब्रह्म पर बातचीत कर रहे हैं ।
(क्रमशः)

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