सोमवार, 25 मई 2020

साच का अंग २२/२५

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*सो काफिर जे बोलै काफ, दिल अपना नहीं राखै साफ ।*
*सांई को पहचानै नांहीं, कूड़ कपट सब उन्हीं माँहीं ॥२२॥*
*साँई का फरमान न मानैं, कहाँ पीव ऐसै कर जानैं ।*
*मन अपणे में समझत नांहीं, निरखत चलैं आपनी छांहीं ॥२३॥*
*जोर करै मसकीन सतावै, दिल उसके में दर्द न आवै ।*
*सांई सेती नांही नेह, गर्व करै अति अपनी देह ॥२४॥*
*इन बातन क्यों पावै पीव, पर धन ऊपर राखै जीव ।*
*जोर जुल्म कर कुटम्ब सौं खाइ, सो काफिर दोजख में जाइ ॥२५॥*
मुसलमान हिन्दुओं को काफ़िर कहते हैं अतः उनको इन लक्षणों द्वारा यह बतला रहे हैं कि काफ़िर किसको कहते हैं ।
जो सत्य को असत्य बतलावे । जिसका हृदय शुद्ध न हो । न कभी प्रभु को पहचानता । न प्रभु की आज्ञा में चलता । ईश्वर कहाँ है, किसने देखा है ऐसा विवाद करता है । शरीर का अध्यास करके शरीर की छाया को देख देख प्रसन्न होता है । अनाथों को दुःखी करता है । विपत्तिग्रस्त मनुष्यों को देखकर भी उन पर दया नहीं करता । शरीर का अभिमान करता है कि यह मेरा है और जुल्म करके कुटुम्बियों से धन हरण कर लेता है । इत्यादि लक्षण वाला काफिर होता है । इन लक्षणों वाला मानव कभी भी प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकता है । प्रत्युत नरक में जाता है,
गीता में-
“जो द्वेषी है, दूसरे के शरीर में विराजमान मुझ परमात्मा से द्वेष करता है । जो नराधम है । इनको मैं बराबर संसार में फेंकता रहता हूँ, कि तुम आसुर योनि में रहो । ये मूढ बार बार आसुर योनियों में जन्म लेते रहते हैं और मेरे को विना प्राप्त किये ही अपनी मूढता के कारण अधमगति को प्राप्त होते हैं ।” 
(क्रमशः)

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