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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २५३/२५६*
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रांम न भूलै बिरहनी, हरदम तोरा नांम ।
दरसन दीजै पालिये, जगजीवन कूं रांम ॥२५३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरही जीवात्मा कभी भी राम नाम को नहीं भूलता है । आपके नाम को याद रखता है अतः अब दर्शन की कृपा कर इस जीव का पोषण कीजिये।
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घायल कीजै मारि मन, बिरही एकै बांणि१ ।
जगजीवन मद जीतिये, परमेसुर कै पांणि२ ॥२५४॥
{१. बांणि-वाण(=तीर)} {२. पांणि-सहारा(आलम्बन)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु इधर उधर भागते इस मन को संयम रुपी बाण से मारकर घायल करें। इसका सारा अहंकार रुपी मद जीतिए इसे अब परमात्मा का ही सहारा है। वे ही सब कर सकते हैं।
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पंथ बतावै प्रेम का, बिरहनी बिरहा रांम ।
सेवग स्वामी रमि रह्या, जगजीवन जिहिं ठांम ॥२५५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरहणी प्रेम मार्ग वहां बता रही है जहाँ प्रभु नाम है और वह जहाँ सेवक स्वामी की सेवा में रत है वह स्थान है। अर्थात प्रभु को पाने का मार्ग स्मरण व सेवा ही है।
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जगजीवन बिरहनि दिया, सरवस पिव के हाथि ।
सिर के साटै३ प्रेम रस, नांम लिया निज आथि४ ॥२५६॥
(३. साटै-बदले में) (४. आथि-अधीन)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरहणी ने अपना सब कुछ प्रभु को सौप दिया है और सर्वस्व देने के बदले प्रभु प्रेम का सुंदर सौदा किया है अर्थात सर्व समर्पण प्रभु में कर दिया है।
(क्रमशः)

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