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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २५७/२६०*
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जगजीवन बिरहनि किया, जग थैं जीव उदास ।
ताथैं निरमल नांम रत, सबद सुरति मन सास ॥२५७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरहणी ने संसार से अपना मन हटाकर प्रभु के निर्मल नाम में लगा लिया है अब उसमें ही रत रह कर हर सांस में स्मरण हो रहा है।
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मांस गल्या मीजी५ गली, हाड६ गल्या हरि हेत ।
जगजीवन पिव के बिरह, स्याह७ भये फिर स्वेत ॥२५८॥
(५. मीजी-मज्जा) (६. हाड-अस्थि) {७. स्याह-काले(केश)} संतजगजीवन जी कहते हैं कि हरि प्रेम विरह में विरहणी की दशा ही पलट गयी है देह की मज्जा गल गयी है हड्डियां गल गयी हैं ऐसा प्रभु का प्रेम रहा कि सारी आयु ही बीत गयी सारे काले केश श्वेत होगये।
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जे कोई बांछै बिरह कों, ताहि न कंपै काम ।
कहि जगजीवन जागि जन, सुरतैं सुमिरै रांम ॥२५९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु विरह रत हैं उसको काम कभी भी नहीं विचलित कर पाता । संत कहते हैं कि हे जीव जाग और ध्यान पूर्वक राम का स्मरण कर।
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पलटे बाइ८ सरीर की, पिव पिव लागै प्यास ।
तब कहुँ बिरहनि हरि लहै, सु कहि जगजीवनदास ॥२६०॥
{८. बाइ-स्वभाव(प्रकृति)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जब कभी देह की प्रकृति ही बदले तभी प्रभु का स्मरण होता है, और दर्शन की प्यास लगती है, और तभी विरही जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त करता है।
(क्रमशः)

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