सोमवार, 25 मई 2020

= *परम साँच का अंग ११९(५/८)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*कंचन काच, काच को कंचन, हीरा कंकर भाखै ।*
*माणिक मणियाँ, मणियाँ माणिक, साँच झूठ कर नाखै ॥*
*पारस पत्थर, पत्थर पारस, कामधेनु पशु गावै ।*
*चन्दन काठ, काठ को चन्दन, ऐसी बहुत बनावै ॥*
*रस को अणरस, अणरस को रस, मीठा खारा होई ।*
*दादू कलिजुग ऐसा बरतै, साचा बिरला कोई ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*परम साँच का अंग ११९*
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साँच साँच तैं अगम है, विरला बूझे कोय ।
रज्जब परम विवेक बिन, घट घट समझ न होय ॥५॥
मायिक सत्य से परम सत्य अगम है, उसे कोई विरला मानव ही समझ पाता है । परम-विवेक बिना, प्रति शरीर में उसे जानने की बुद्धि नहीं होती ।
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साँच हि मिलै सु साँच ह्वै, झूठ हि मिलै सु झूठ ।
जन रज्जब साँची कही, भावे रीझ भावे रूठ ॥६॥
सत्य ब्रह्म से मिलने पर सत्य ब्रह्म ही हो जाता है, झूठी माया से मिलने से मिलने पर झूठ ही बना रहता है । यह बात हमने सत्य ही कही है, अब चाहे तुम प्रसन्न हो वा रुष्ट हो ।
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दिब१ दाझै२ नहिं साँच है, मिलै न अविगत३ नाथ ।
सीझा४ सीझा सब कहैं, रज्जब देख सु हाथ ॥७॥
सत्य है तो परीक्षार्थ तप्त लोह गोला१ न जलायेगा२, सभी जन हाथ देखकर कहते हैं, यह सिद्धावस्था४ को प्राप्त हो गया किन्तु उसे परम सत्य बिना प्रभु३ की प्राप्ति नहीं होती ।
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कामधेनु तरु१ सुर सहित, पारस पोरस साच ।
रज्जब रिधि-सिधि निधि सभी, भजन विमुख कुल२ काच ॥८॥
कामधेनु, देवताओं के सहित कल्पवृक्ष१, पारस, पोरसा(सुवर्ण प्रदाता सुवर्ण का मनुष्याकार पुतला) ॠद्धि सिद्धि, निधि सभी२ हैं हरि भजन से विमुख होने पर काच तुल्य हैं परम सत्य नहीं हैं ।
(क्रमशः)

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