शुक्रवार, 29 मई 2020

*१५१. धन मांगने वाले भृत्‍य को दण्‍ड*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू जे साहिब लेखा लिया,*
*तो शीश काट शूली दिया ।*
*मिहर मया कर फिल किया,*
*तो जीये जीये कर जिया ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१५१. धन मांगने वाले भृत्‍य को दण्‍ड*
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धनमपि परदत्तं दु:खमौचित्‍यभाजां
भवति हृदि तदेवानन्‍दकारीतरेषाम्।
मलयजरसविन्‍दुर्बाधते नेत्रमन्‍त-
र्जनयति च स एवाह्लादमन्‍यत्र गात्रे॥[१]
([१] विषयों के त्‍याग से ही पूर्ण शान्ति प्राप्‍त हो सकती है, ऐसा जिन्‍हें दृढ़ विश्‍वास हो गया है उन औचित्‍य के उपासक महापुरुषों को दूसरों के द्वारा दिया हुआ धन भी दु:खदायी ही प्रतीत होता है, वही धन यदि विषयी पुरुषों के लिये दे दिया जाये तो उनके हृदय में वह परम आनन्‍द और आह्लाद उत्‍पन्‍न करने वाला होता है, जिस प्रकार सुगन्धित मलयाचल चन्‍दन का रख आँखों में डालने से दु:खदायी प्रतीत होता है। और अन्‍य अंगों में लगाने से शीतलता प्रदान करने वाला होता है। सु. र. भां. ६७/१८)
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प्रेमरूपी धन की प्राप्ति में ही सदा यत्‍नशील रहते हैं, वे उदरपूर्ति के लिये अन्‍न और अंग रक्षा के लिये साधारण वस्‍त्रों के अतिरिक्‍त किसी प्रकार के धन का संग्रह नहीं करते। धन का स्‍वभाव है लोभ उत्‍पन्‍न करना और लोभ से द्वेष की प्रगाढ़ मित्रता है। जहाँ लोभ रहेगा वहाँ दूसरों के प्रति द्वेष अवश्‍य विद्यमान रहेगा।
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द्वेष से घृणा होती है और पुरुषों के प्रति घृणा करना यही नाश का कारण है। इन्‍हीं सब बातों को सोचकर तो त्‍यागी महापुरुष द्रव्‍य का स्‍पर्श नहीं करते। वे जहाँ तक हो सकता है, द्रव्‍य से दूर ही रहते हैं। गृहस्थियों का तो द्रव्‍य के बिना काम चलना ही कठिन है, उन्‍हें तो गृहस्‍थी चलाने के लिये द्रव्‍य रखना ही होगा, किन्‍तु उन्‍हें भी अधर्म से या अनुचित उपायों से धनार्जन करने की प्रवृत्ति को एकदम त्‍याग देना चाहिये।
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धर्म पूर्वक न्‍यायोचित रीति से प्राप्‍त किया हुआ धन ही फलीभूत होता है और वही उन्‍हें संसारी बन्‍धनों से छुड़ाकर धीरे-धीरे परमार्थ की ओर ले जाता है। जो संखिया वैसे ही बिना सोचे-विचारे खा लिया जाये तो वह मृत्‍यु का कारण होता है और उसे ही वैद्य के कथनानुसार शोधकर खाया जाय तो वह रसायन का काम करता है, उससे शरीर नीरोग होकर सम्‍पूर्ण अंग पुष्‍ट होते हैं। इसलिये वैद्य रूपी शास्‍त्र की बतायी हुई धर्मरूपी विधि से सेवन किये जाने वाला विषरूपी धन भी अमरता प्रदान करने वाला होता है।
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‍चैतन्यदेव जिस प्रकार स्‍त्री संगियों से डरते थे, उसी प्रकार धनलोलुपों से भी वे सदा सतर्क रहते थे। जो स्‍त्री सेवन अविधिपूर्वक कामना वासना की पूर्ति के लिये किया जाता है, शास्‍त्रों में उसी की निन्‍दा और उसी कामिनी को नरक का द्वार बताया है। जिसका पाणि ग्रहण‍ शास् शास्त्र मर्यादा के साथ विधि पूर्वक किया गया है, वह तो कामिनी नहीं, धर्म पत्नि है।
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उसका उपयोग कामवासनातृप्ति न होकर धार्मिक कृत्‍यों में सहायता प्रदान करना है। ऐसी स्त्रियों का संग तो प्रवृत्ति मार्ग वाले गृहस्थियों के लिये परम धर्म है। इसी प्रकार धर्म पूर्वक विधियुक्‍त, विनय और पात्रता के साथ उपार्जन किया हुआ धन धर्म तथा सुख का प्रधान कारण होता है।
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उस धन को कोई अन्‍यान से अपनाना चाहता है तो वह विषयी है, ऐसे विषयी लोगों का साथ कभी भी न करना चाहिये। श्री अद्वैताचार्य गृहस्‍थी थे, इस बात को तो पाठक जानते ही होंगे। उनके दो स्त्रियां थीं, छ: पुत्र थे, दो-चार दासी-दास भी थे, बड़े पुत्र अच्‍युतानन्‍द को छोड़कर सभी घर-गृहस्‍थी वाले थे। सारांश कि उनका परिवार बहुत बड़ा था। इतना बड़ा परिवार होने पर भी वे भक्‍त थे।
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भक्‍तों को बहुधा लोग बावला कहा करते हैं। एक कहावत भी है-
भक्त बावले ज्ञानी अल्‍हड़, योगी बडे निखट्टू।
कर्मकांडी ऐसे डोलें, ज्‍यों भाड़े के टट्टू॥
अस्‍तु, बावले भक्‍तों के यहाँ 'यह मेरा है, यह तेरा है 'का तो हिसाब ही नहीं। जो भी आओ खूब खाओ। जिसे जिस चीज की आवश्‍यकता हो, ले जाओ। सबके लिये उनका दरवाजा खुला रहता है।
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वास्‍तव में उदारता इसी का नाम है। जिसके यहाँ मित्र, अतिथि, स्‍वजन और अन्‍य जन बिना संकोच के घर की भाँति रोज भोजन करते हैं, जिसका हाथ सदा खुला रहता है, वही सच्‍चा उदार है, वही श्री कृष्‍ण प्रेम का अधिकारी भी होता है। जिसे पैसों से प्रेम है, जो द्रव्‍य का लोभी है, वह भगवान से प्रेम कर ही कैसे सकता है?
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वैष्‍णवों के लिये अद्वैताचार्य जी का घर धर्मशाला ही नहीं किंतु नि:शुल्‍क भोजनालय भी था ! जो भी आवे जब तक रहना चाहे आचार्य के घर पड़ा रहे। आचार्य सत्‍कारपूर्वक उसे खिलाते-पिलाते थे। इस उदार वृत्ति के कारण आचार्य पर कुछ कर्ज भी हो गया था।
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उनके यहाँ बाउल विश्‍वास नाम का एक भृत्‍य था। आचार्य के चरणों में उनकी अनन्‍य श्रद्धा थी और वह उनके परिवार की सदा तन-मन से सेवा किया करता था। वह आचार्य के साथ-साथ पुरी भी जाया करता था। आचार्य को द्रव्‍य का संकोच होता है, इससे उसे मानसिक दु:ख होता था। उनके ऊपर कुछ ऋण भी हो गया, इसका उसे स्‍वयं ही सोच था !
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पुरी में उसने प्रभु का इतना अधिक प्रभाव देखा। महाराज प्रतापरुद्र जी प्रभु को ईश्‍वर तुल्‍य मानते थे और गुरु भाव से उनकी प्रत्‍येक आज्ञा का पालने करने के लिये तत्‍पर रहते थे। विश्‍वास ने सोचा- 'महाराज से ही आचार्य के ऋण परिशोध के लिये क्‍यों न कहा जाय? यदि महाराज के कानों तक यह बात पहुँच गयी तो सदा के लिये इनके व्‍यय का सुदृढ़ प्रबन्‍ध हो जायेगा।
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'यह सोचकर उसने आचार्य से छिपकर स्‍वयं जाकर महाराज प्रतापरुद्र जी को एक प्रार्थना-पत्र दिया। 'उसमें उसने आचार्य को साक्षात ईश्‍वर का अवतार बताकर उनके ऋणपरिशोध और व्‍यय का स्‍थायी प्रबन्‍ध कर देने की प्रार्थना की। महाराज ने वह पत्र प्रभु के पास पहुँचा दिया। पत्र को पढ़ते ही प्रभु आश्‍चर्य चकित हो गये।
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उनके प्रभाव का इस प्रकार दुरुपयोग किया जाता है, यह सोचकर उन्‍हें विश्‍वास के ऊपर रोष आया। उसी समय गोविन्‍द को बुलाकर प्रभु ने कठोरता के साथ आज्ञा दी- 'गोविन्‍द ! देखना आज से बाउल विश्‍वास हमारे यहाँ न आने पावे। वह हमारे और आचार्य के नाम को बदनाम करने वाला है।
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'गोविन्‍द सिर नीचा किये हुए चुपचाप लौट गया। उसने नीचे जाकर ठहरे हुए भक्‍तों से कहा। भक्‍तों के द्वारा आचार्य को इस बात का पता लगा। वे जल्‍दी से प्रभु के पास दौड़े आये और उनके पैर पकड़कर गद्गद कण्‍ठ से कहने लगे- 'प्रभो ! यह अपराध तो मेरा है। बाउल ने जो भी कुछ किया है, मेरे ही लिये किया है। इसके लिये उसे दण्‍ड न देकर मुझे दण्‍ड दीजिये। अपराध के मूल कारण तो हमी हैं।'
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महाप्रभु आचार्य की प्रार्थना की उपेक्षा न कर सके। आचार्य के अवतारी होने में उन्‍हें कोई आपत्ति नहीं थी। किन्‍तु अवतारी होकर क्षुद्र पैसों के लिये विषयी पुरुषों से प्रार्थना की जाय यह अवतारी पुरुषों के‍ लिये महान कलंक की बात है। आवश्‍यकता पड़ने पर याचना करना पाप नहीं है, किन्‍तु अवतारप ने की आड़ में द्रव्‍य मांगना महापाप है, बेचारा बावला बाउल क्‍या जाने, उस अशिक्षित नौकर को इतनी समझ कहाँ, उसने तो अपनी तरफ से अच्‍छा ही समझकर यह काम किया था। प्रभु ने अज्ञान में किये हुए उसके अपराध को क्षमा कर दिया और भविष्‍य में फिर ऐसा कभी न करने के लिये उसे समझा दिया।
(क्रमशः)

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