🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*४. विरह कौ अंग ~ २४९/२५२*
.
कोई लाधै मरम की, बिरही जन की चोट ।
जगजीवन सोई लखै, मारि किया जे लोट ॥२४९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ जीवात्मा ही रहस्य की बात या तत्व की बात जान पाता है कि विरह पीड़ा क्या है इसे वे ही समझ सकते हैं जिन्होंने ये चोट झेली हो।
.
कोई बैरागी कहै, कोई कहै ग्रिहस्थ ।
जगजीवन कोइ कुछ कहै, बिरही निरखै बस्त ॥२५०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरही जन को कोइ वैरागी कहते हैं कोइ गृहस्थ कहते हैं विरहणी को इससे कोइ फर्क नहीं पड़ता वे जीवात्मा तो अपनी प्रिय वस्तु या लक्ष्य प्रभु में ही ध्यानस्थ हैं।
.
जगजीवन सुमिरण बंधै, सुरतैं भाखै नांम ।
बिरह जगाया बिरहनी, रूचि स्यूँ बिलसै रांम ॥२५१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरहणी सुमिरण को दृढ कर ध्यानस्थ हो प्रभु नाम रटती है इस प्रकार से विरह द्वारा विरही जीव राम नाम में आनंदित रहता है।
.
जगजीवन पावन किया, परतखि४ काटी पासि ।
इब सौ बिलसै बिरहनी, सुख सागर की रासि ॥२५२॥
(४. परतखि-प्रत्यक्ष)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरहणी ने अपना जीवन यम त्रास काटकर पावन भय मुक्त कर लिया है अब वह अपार सुख के समुद्र में आनंदित है।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें