शनिवार, 30 मई 2020

*४. विरह कौ अंग ~ २७३/२७६*

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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २७३/२७६*
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आसिक पाक अलह लहै, दम करार दिल धोइ ।
कहि जगजीवन हकीकत, अलिफ इलम रा जोइ ॥२७३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सच्चे साधक अल्लह को पवित्र होकर चाहते हैं। संत कहते हैं कि वे सच में सच्चे ज्ञान साधक हैं।
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अैन अलफ अल्लह कह्यौ, आसिक की दिल आइ ।
कहि जगजीवन इलम सब, खबर भई चित ताहि ॥२७४॥ 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अगर भक्त के मन में यह बात आजाये कि मुझे इन प्रभु अल्लह के सिवा कुछ बोलना ही नहीं है तो सारा ज्ञान ध्यान उधर ही रहेगा और फिर प्रभु को भी खबर हो जायेगी कि कोइ उन्हें याद करता है।
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ॐकार सोई अलिफ, अलह अलख दोइ नांम ।
कहि जगजीवन एक हरि, एहि रहीम एह रांम ॥२७५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो ओमकार है वह ही अल्लाह है नाम ही दो है यह ही हरि है ये ही रहीम है यै ही राम है।
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रांम नांम जिस अलिफ मंहि, सोइ इलम चित आंन ।
कहि जगजीवन पाठ सब, दोइ अक्शर मंहि जांन ॥२७६॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिस वर्णाक्षरी में राम का नाम हो वह ही सच्चा ज्ञान जाने। इन दो अक्षर में ही सब कुछ ज्ञान जाने।
(क्रमशः)

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