गुरुवार, 21 मई 2020

*१४७. नीलाचल में सनातन जी*

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*जे जन आपा मेट कर, रहैं राम ल्यौ लाइ ।*
*दादू सब ही देखतां, साहिब सौं मिल जाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ जीवत मृत्तक का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४७. नीलाचल में सनातन जी*
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सनातन जी ने आत्‍मघात का विचार तो परित्‍याग कर दिया, किन्‍तु प्रभु के आलिंगन करने के कारण उन्‍हें सदा सकोंच बना रहता। वे सदा प्रभु से बचे ही र‍हते किन्‍तु प्रभु उन्‍हें खोजकर आलिंगन करते। इससे वे सदा व्‍यथित-से बने रहते। एक दिन उन्‍होंने अपनी मनोव्‍यथा पुरी में ही प्रभु के समीप निवास करने वाले जगदानन्‍द पण्डित से कही।
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जगदानन्‍द जी ने कहा- 'आपका पुरी में ही रहना ठीक नहीं है। आषाढ़ में रथ यात्रा के दर्शन करके यहाँ से सीधे वृन्‍दावन चले जाइये। आपके लिये प्रभु ने वही देश दिया है, उस प्रभुदत्त देश में जाकर भगवन्‍नाम-जप करते हुए समय व्‍यतीत कीजिये।'
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सनातन जी ने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- 'पण्डित जी ! आपने यह बड़ी ही उत्‍तम सम्‍मति दी। आषाढ़ के पश्‍चात मैं यहाँ से अवश्‍य ही चला जाऊँगा।' ऐसा निश्‍चय करके वे रथ यात्रा की प्रतीक्षा करने लगे। एक दिन बातों-ही-बातों में उन्‍होंने प्रभु से कहा- 'प्रभो ! मुझे पण्डित जगदानन्‍द जी ने बड़ी सुन्‍दर सम्‍मति दी है। रथ यात्रा करके मैं वृन्‍दावन चला जाऊँगा और वहीं रहूँगा।
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'प्रभु जगदानन्‍द के ऐसे भाव को समझकर उनके ऊपर प्रेम का क्रोध प्रकट करते हुए कहने लगे- जगदानन्‍द अपने को अब बड़ा भारी पण्डित समझने लगा, जो सनातन जी को भी शिक्षा देने लगा। हमें शिक्षा दे तो ठीक भी है, सनातन जी तो अभी इसे सैकड़ों वर्षों तक पढ़ा सकते हैं। मूर्ख कहीं का, कलका छोकड़ा होकर इतने बड़े लोगों को सम्‍मति देने चला है।'
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इस बात को सुनकर जगदानन्‍द जी तो सन्‍न पड़ गये, काटो तो शरीर में रक्‍त नहीं ! वे डबडबायी आँखों से पृथ्‍वी की ओर देखने लगे। तब सनातन जी ने अत्‍यन्‍त ही विनम्र भाव से प्रभु के पैर पकड़े हुए कहा- 'प्रभो ! जगदानन्‍द जी ने तो मेरे हितकी ही बात कही है। आप मुझ पतित को स्‍पर्श करते हैं, इस बात से किसे दु:ख न होगा? मैं स्‍वयं संकुचित बना रहता हूँ।
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प्रभु ने फिर उसी स्‍वर में कहा- 'इसे मेरे शरीर की इतनी चिन्‍ता क्‍यों? यह शरीर ही सब कुछ समझता है। इसे वैष्‍णवों के माहात्‍म्‍य का पता नहीं। सनातन जी के शरीर को यह अन्‍य साधारण लोगों के शरीर के समान समझता है। इसे पता नहीं, सनातन जी का शरीर चिन्‍मय है। उसे खुजली और कुष्‍ठ कहाँ?
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यह तो उन्‍होंने मेरे प्रेम की परीक्षा के निमित्त अपने शरीर में उत्‍पन्‍न कर ली है कि मैं घृणा करके इनके शरीर को स्‍पर्श न करूँ। कोई भाग्‍यवान पुरुष सनातन जी के शरीर को सूँघे तो सही, उसमें से दिव्‍य सुगन्‍ध निकलती रहती है। मैं कुछ सनातन जी के ऊपर कृपा करने के निमित्त उनका आलिंगन थोड़े ही करता हूँ, मैं तो उनके शरीर-स्‍पर्श से अपने देह को पावन बनाता हूँ।'
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प्रभु के मुख से अपनी इतनी भारी प्रशंसा सुनकर सनातन जी रोते-रोते कहने लगे- 'प्रभो ! मैंने ऐसा कौन-सा घोर अपराध किया है, मेरे किन जन्‍मों के अनन्‍त पाप आज आकर उदय हुए हैं, जो आप मुझे यह प्रशंसारूपी हलाहल विष पिला रहे हैं। जगदानन्‍द जी का आज भाग्‍य उदय हुआ। आज त्रिलोकी में इनसे बढ़कर भाग्‍यवान कौन होगा, जिनकी वात्‍सल्‍य स्‍नेह से पुत्र की भाँति प्रभु भर्त्‍सना कर रहे हैं।
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हाय ऐसी प्रेममयी भर्त्‍सना जिनके भाग्य में बदी है, वे महानुभाव धन्‍य हैं ! गुरुजन जिनकी नित्‍य आलोचना करते रहते हैं, वे परम सौभाग्‍यशाली पुरुष हैं।
हे करुणा के सागर प्रभो ! इस अधम को किस अपराध से अपनेपन से पृथक करके आपने यह प्रशंसा रूपी सर्पिणी बलपूर्वक मेरे गले से लपेट दी। नाथ ! मैं अब अधिक सहन न कर सकूँगा।
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'सनातन जी की ऐसी कातर वाणी सुनकर प्रभु कुछ लज्जित-से हो गये और अत्‍यन्‍त ही प्रेम के स्‍वर में जगदानन्‍द जी की ओर देखकर कहने लगे- 'जगदानन्‍द ने मरे शरीर के स्‍नेह से और तुम्‍हारे आग्रह से ही ऐसी सम्‍मति दे दी होगी। मैंने अपने क्रोध के आवेश में ऐसी बातें इनके लिये कह दीं होगी। इसका कारण मेरा तुम्‍हारे ऊपर सहज स्‍नेह ही है। तुम इस वर्ष यहीं मेरे पास ही रहो, अगले वर्ष वृन्दावन जाना।'
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इतना कहकर प्रभु ने सनातन जी का फिर जोरों से आलिंगन किया। बस, फिर क्‍या था ! न जाने वह खुजली और उसकी पीड़ा कहाँ चली गयी ! उसी समय उनकी खाज अच्‍छी हो गयी और दो-चार दिन में उनके घाव अच्‍छे होकर उनका शरीर सुवर्ण के समान कान्ति वाला बन गया।
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रथ यात्रा के समय अद्वैताचार्य, नित्यानन्द आदि सभी गौड़ीय भक्त प्रतिवर्ष की भाँति अपने स्‍त्री-बच्‍चों के सहित पुरी में आये। प्रभु ने उन सबसे सनातन जी का परिचय कराया। सनातन जी प्रभु के परम कृपा पात्र इन सभी प्रेमी भक्‍तों का परिचय पाकर परम प्रसन्‍न हुए और उन्‍होंने सभी की चरणवन्‍दना की।
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सभी ने सनातन जी की श्रद्धा, दीनता और तितिक्षा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। बरसात के चार महीने रहकर सभी भक्‍त देश के लिये लौट गये, किन्‍तु सनातन जी वहीं रह गये। वे दूसरे वर्ष प्रभु से विदा होकर और उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके पुरी से सीधे ही काशी होते हुए वृन्‍दावन पहुँचे।
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पुरी से चलते समय वे बलभद्र भट्टाचार्य से उस रास्‍ते के सभी स्‍थानों के नाम लिख ले गये थे, जिस रास्‍ते से प्रभु वृन्‍दावन गये थे, उन सभी स्‍थानों का दर्शन करते हुए और प्रभु की लीलाओं का स्‍मरण करते हुए उसी रास्‍ते से सनातन जी वृन्‍दावन पहुँचे। तब तक श्री रूप जी वृन्‍दावन में नहीं पहुचे थे। सनातन जी वहीं वृन्‍दावन वृक्षों के नीचे अपना समय बिताने लगे। कुछ दिनों के अनन्‍तर गौड़ देश से श्री रूप जी भी वृन्‍दावन पहुँच गये और दोनों भाई साथ ही श्री कृष्‍ण कथा कीर्तन करते हुए कालयापन करने लगे।
(क्रमशः)

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