🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू सबको संकट एक दिन, काल गहैगा आइ ।*
*जीवित मृतक ह्वै रहै, ताके निकट न जाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ जीवत मृत्तक का अंग)*
========================
साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
.
*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
.
*१४७. नीलाचल में सनातन जी*
.
हम दोनों ने एक दिन परीक्षा से निमित्त उनसे कहा- 'अनूप ! तुम स्वयं समझदार हो, श्री रामचन्द्र जी की लीलाओं की अपेक्षा श्री कृष्णचन्द्र जी की लीलाओं में अधिक माधुर्य है, इसलिये तुम श्री कृष्ण को ही अपना उपास्यदेव क्यों नहीं बना लेते। इससे तीनों ही भाई श्री कृष्णोपासक होकर साथ-ही-साथ उपसना-भजन और कीर्तन किया करेंगे।'
.
वे हम दोनों का अत्यधिक आदर करते थे; हमारी बात को उन्होंने कभी नहीं टाला। हमारे ऐसे कथन को उन्होंने स्वीकार कर लिया और कहा- 'आप दोनों भाई ही मेरे गुरु, माता-पिता तथा शिक्षक हैं। आप जैसा कहेंगे वैसा ही करुँगा। कल मुझे कृष्णमन्त्र की ही दीक्षा दे देना।'
.
इतना कहकर वे सोने चले गये। हमने देखा, वे रात्रि भर हाय-हाय करते रहे, एक क्षण को भी नहीं सोये। प्रात: काल उन्होंने आकर हमसे कहा- 'भाइयो ! मैं क्या करूँ, यह सिर तो मैं श्री सीताराम जी के में चढ़ा चुका। रात्रि को मैंने बहुत चेष्टा की कि उस चढ़ाये हुए सिर को फिर से लौटा लूँ, किन्तु मेरी हिम्मत नही पड़ी। मैं इस शरीर को प्रसन्नता पूर्वक त्याग सकता हूँ, किन्तु मुझसे श्री सीताराम जी की उपासना न छोड़ी जायगी।'
.
उनकी ऐसी ऐकान्तिक निष्ठा को देखकर हमें परम आश्चर्य हुआ और अपनी निष्ठा को बार-बार धिक्कार ने लगे। सो, प्रभो ! वे मेरे भाई सचमुच ही अनूप थे, उनकी उपमा किसी से दी ही नहीं जा सकती।' प्रभु ने कहा- 'यथार्थ निष्ठा तो इसी का नाम है। ठीक इसी प्रकार मैंने श्री रामोपासक मुरारी गुप्त से भी यही बात कही थी और उन्होंने भी यही उत्तर दिया था। सेव्य- सेवक का भाव इसी प्रकार ऐकान्तिक और दृढ़ होना चाहिये, जो किसी प्रकार के भी प्रलोभन आने पर हिल न सके। तभी प्रभु प्रेम की प्राप्ति हो सकती है।'
.
इस प्रकार प्रभु बहुत देर तक श्री सनातन जी से बातें करते रहे। अन्त में उन्हें वहीं हरिदास जी के ही समीप रहने का आदेश देकर आप अपने स्थान के लिये चले गये और गोविन्द के हाथों दोनों के ही लिये श्री जगन्नाथ जी का महाप्रसाद भिजवाया। इस प्रकार सनातन जी पुरी में ही हरिदास जी के समीप रहने लगे। प्रभु नियमित रूप से इन दोनों को देखने के लिये आया करते थे।
.
श्री सनातन जी लगभग चैत्रमास में पुरी पधारे थे। वे भीतर मन्दिर में दर्शनों के लिये न जाकर दूर से ही मन्दिर की पताका को प्रणाम कर लेते थे। शरीर का भोग अच्छे-अच्छे महापुरुषों को भी भोगना पड़ता है, सनातन जी की भंयकर खाज अभी अच्छी नहीं हुई। खुजाते-खुजाते उनके सम्पूर्ण शरीर में बड़-बड़े घाव हो गये और उनमें से निरन्तर पीब बहता रहता था। ज्येष्ठ का महीना था।
.
प्रभु पुरी से चार-पांच मील की दूरी पर यमेश्वर टोटा में गये हुए थे। बारह बजे उन्होंने सनातन को भी भिक्षा के लिये वहीं बुलाया। यमेश्वर जाने के लिये दो मार्ग थे- एक तो सिंहद्वार होकर सीधे सड़क-सड़क जाना होता है, दूसरे समुद्र के किनारे-किनारे भी यमेश्वर जा सकते हैं।
.
ज्येष्ठ की प्रखर धूप के कारण समुद्र-किनारे की बालू जल रही थी। यदि उसमें कच्चा चना डाल दिया जाय तो क्षणभर में भुनकर खिल जाये। उस बालू में मनुष्य की तो बात ही क्या, बारह बजे पशु भी जाने में हिचकता हैं, किन्तु जब सनातन जी ने सुना कि प्रभु ने मुझे बुलाया है, तब तो ये अपने भाग्य की सराहना करते हुए उसी बालुकामय पथ से नंगे पैरों ही प्रभु के समीप पहुँचे।
.
शरीर को सर्दी-गर्मी का सुख-दु:ख व्यपता ही है। सनातन जी के पैरों में बड़े-बड़े छाले पड़ गये। प्रभु ने उन्हें देखते ही पूछा- 'अरे ! तुम इतनी धूप में किधर होकर आये हो?' सरलता के साथ सनातन जी ने कहा- 'प्रभो ! समुद्र तट के रास्ते से ही आया हूँ।'
.
प्रभु ने उनके पैरों के छालों को देखते हुए कहा- 'देखो, नंगे पैरों तप्त बालू में आने से तुम्हारे पैरों में छाले पड़ गये। तुम सिंहद्वार के रास्ते होकर क्यों नहीं आये?' सनातन जी ने दीनता के साथ कहा- प्रभो ! सिंहद्वार होकर श्री जगन्नाथ जी के सेवक तथा दर्शनार्थी आते-जाते रहते हैं, उनसे कहीं भूल में स्पर्श हो जाय तो मैं ही पाप का भागी बनूँगा। इसी भय से मैं सिंहद्वार होकर नहीं आया।'
.
प्रभु इनकी ऐसी मर्यादा, दीनता और सरलता को देखकर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और उनका जोरों से गाढ़ालिंगन करते हुए कहने लगे- 'सनातन ! तुम धन्य हो, तुम्हीं वैष्णवता के सच्चे रहस्य को समझे हो। यद्यपि तुम्हारे लिये स्वयं कोई विधि-निषेध नहीं है, फिर भी तुम लोक मर्यादा के निमित्त ऐसा व्यवहार करते हो, यह सर्वश्रेष्ठ है। मुनष्य चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न कर ले फिर भी उसे मर्यादा का उल्लंघन न करना चाहिये। क्योंकि मर्यादा भंग करने से लोकनिन्दा होती है और लोकनिन्दा से सदा पतन का भय बना रहता है।'
.
सनातन के आलिंगन से प्रभु के सुवर्ण के समान सुन्दर शरीर में कई जगह पीब लग गया, इससे सनातन जी को अपार दु:ख हुआ, वे सोचने लगे 'क्या करूं, प्रभु तो मेरा आलिंगन बिना किये मानते ही नहीं ! इसीलिये अब इस भंयकर शरीर को रखकर क्या करूंगा। प्रभु के दर्शन तो हो ही गये। रथ यात्रा के दिन जगन्नाथ जी के दर्शन और करके उन्हीं के रथ के नीचे पिचकर मर जाऊंगा !'
.
महाप्रभु इनके मनोभाव को समझ गये। वे एक दिन भक्तों के सहित आकर सनातन जी से बातें करने लगे। उन्होंने बातों-ही बातों में कहा- 'सनातन ! शरीर त्याग ने से तुमने क्या लाभ सोचा है? मनुष्य का अन्तिम पुरुषार्थ प्रभु प्राप्ति है, यदि शरीर त्याग ने से प्रभु प्राप्ति हो सके, तो मैं तो हजारों बार शरीर धारण करके उन्हें त्याग ने को तैयार हूँ।
.
इस प्रकार शरीर त्यागना तामसी प्रवृति है। जो संसारी तापों से खिन्न होकर किसी कारण से शरीर से ऊबकर प्राण त्याग देते हैं, उनकी सदगति नहीं होती। उन्हें फिर कर्मों के भोग के निमित्त आसुरी प्रकृति के शरीर धारण करने होते हैं। शरीर का सदप्रयोग श्रीकृष्ण संकीर्तन करने में ही है। यदि आसुरी प्रकृति के शरीर धारण करने होते हैं।
.
शरीर का सदुपयोग श्री कृष्ण संकीर्तन करने में ही है। यदि भगवन्नामचिन्तन और स्मरण बना रहता है तो फिर शरीर कैसी भी दशा में रहे, विवेकी पुरुषो को शरीर की कुछ भी परवा न करनी चाहिये।' प्रभु की बात सुनकर नीचा सिर किये हुए सनातन जी ने कहा- 'प्रभो ! इस बेकार और अपवित्र शरीर को रखवाकर आप इससे क्या कराना चाहते हैं? इससे तो अब दूसरों को दु:ख के सिवा किसी प्रकार का लाभ नहीं पहुँचता।'
.
प्रभु ने कहा- 'तुम्हें हानि-लाभ से क्या? तुम तो अपने शरीर को मुझे सौंप चुके। दान की हुई वस्तु को लौटाकर कोई उसका मनमाना उपयोग कर सकता है? तुम्हारे जाने मैं इसका कुछ भी उपयोग करूँ, तुम्हें इसे नष्ट करने का अधिकार नहीं है। इससे मुझे बड़े-बड़े काम कराने हैं।' सनातन जी ने धीरे से कहा- 'प्रभो ! आपकी आज्ञा का उल्लंघन करने की शक्ति ही किसमें है? जैसी आप आज्ञा करेंगे, वही मैं करूँगा। इस प्रकार सनातन जी को समझा-बुझाकर प्रभु भक्तों के सहित स्थान के लिये चले गये।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें