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*दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम ।*
*सुख सागर चलि जाइए, दादू तज बेकाम ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४८. श्री रघुनाथदास जी का गृह त्याग*
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गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात्
पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्।
दैवं न तत् स्यान्न पतिश्च स स्या-
न्न मोचयेद्य: समुपेतमृत्युम्॥[१]
([१] मृत्यु के पाश से बंधे हुए पुरुष को जो संसार बन्धन से छुड़ाने में समर्थ नहीं होता वह अक्षर पढ़ाने पर भी वास्तविक गुरु नहीं है, कुटुम्ब में उत्पन्न होने पर भी स्वजन नहीं है, वीर्य से उत्पन्न करने वाला होने पर भी सच्चा पिता नहीं है, शरीर को पैदा करने वाली होने पर भी वह वास्तविक माता नहीं है, माननीय होने पर भी वह यथार्थ दैव नहीं है और पाणिग्रहण करने पर भी वह सच्चा पति नहीं है। श्रीमद्भा. ५/५/१८)
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सप्तग्राम के भूम्यधिकारी श्री गोवर्धनदास मजूमदार के पुत्र श्री रघुनाथदास जी को पाठक भूले न होंगे। शान्तिपुर में अद्वैताचार्य जी के घर पर ठहरे हुए प्रभु के उन्होंने दर्शन किये थे और प्रभु ने उन्हें मर्कट वैराग्य त्याग कर घर में ही रहते हुए भगवत-भजन करने का उपदेश दिया था और उनके गृहत्याग के अत्यन्त आग्रह करने पर प्रभु ने कह दिया था- 'अच्छा देखा जायगा। अब तो तुम घर चले आओ, हम शीघ्र ही वृन्दावन को जायँगे, यहाँ से लौटकर जब हम आ जायँ, तब जैसा उचित हो वैसा करना।'
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अब जब रघुनाथ जी ने सुना की प्रभु व्रजमण्डल की यात्रा करके पुरी लौट आये हैं, तब तो वे चैतन्य चरणों के दर्शनों के लिये अत्यन्त ही लालायित हो उठे। उनका मन-मधुप प्रभु के पादप का मकरन्द पान करने के निमित्त पागल-सा हो गया, वे गौरांग का चिन्तन करते हुए ही समय को व्यतीत लगे। ऊपर से तो सभी संसारी कामों को करते रहते, किन्तु भीतर उनके हृदय में चैतन्य विरहजनित अग्नि जलती रहती।
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वे उसी समय सब कुछ छोड़-छाड़कर चैतन्य चरणों का आश्रय ग्रहण कर लेते, किन्तु उस समय उनके परिवार में एक विचित्र घटना हो गयी ! सप्तग्राम का ठेका पहले एक मुसलमान भूम्यधिकारी पर था। वही उस मण्डल का चौधरी था, उस पर से ही इन्हें इस इलाके का अधिकार प्राप्त हुआ था।
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वह प्रतिवर्ष आमदनी का चतुर्थांश अपने पास रखकर तीन अंश बादशाह के दरबार में जमा करता था। उस मण्डल की समस्त आमदनी बीस लाख रूपये सालना की थी। हिसाब से इन मजूमदार भाइयों को पंद्रह लाख राजदरबार में जमा करने चाहिये और पांच लाख अपने पास रखने चाहिये, किन्तु ये अपने कायस्थप ने के बुद्धि कौशल से बारह ही लाख जमा करते और आठ लाख स्वयं रख लेते।
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चिरकाल से ठेका इन्हीं पर रहने से इन्हें भूम्यधिकारी होने का स्थायी अधिकार प्राप्त हो जाना चाहिये था, क्योंकि बारह वर्ष में ठेका स्थायी हो जाता है, इस बात से उस पुराने चौधरी को चिढ़ हुई। उसने राजदरबार में अपना अधिकार दिखाते हुए इन दोनों भाइयों पर अभियोग चलाया और राजमन्त्री को अपनी ओर मिला लिया।
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इसीलिये इन्हें पकड़ने के लिये राजकर्मचारी आये। अपनी गिरफ्तारी समाचार सुनकर हिरण्यदास और गोवर्धनदास- दोनों भाई घर छोड़कर भाग गये। घर पर अकेले रघुनाथदास जी ही रह गये, चौधरी ने इन्हें ही गिरफ्तार करा लिया और कारावास में भेज दिया।
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यहाँ इन्हें इस बात के लिये रोज डराया और धमकाया जाता था कि ये अपने ताऊ(पिता के बड़े भाई) और पिता का पता बता दें, किन्तु इन्हें उनका क्या पता था, इसलिये वे कुछ भी नहीं बता सकते थे। इससे क्रुद्ध होकर चौधरी इन्हें भाँति-भाँति की यातनाएँ देने की चेष्टा करता, बुद्धिमान और प्रत्युत्पन्नमति रघुनाथदास जी ने सोचा- 'ऐसे काम नहीं चलेगा। किसी-न-किसी प्रकार इस चौधरी को ही वश में करना चाहिये।'
ऐसा निश्चय करके वे मन-ही-मन उपाय सोचने लगे। एक दिन जब चौधरी इन्हें बहुत तंग करना चाहता था, तब इन्होंने स्वाभाविक स्नेह दर्शाते हुए अत्यन्त ही कोमल स्वर से कहा- 'चौधरी जी ! आप मुझे क्यों तंग करते हैं? मेरे ताऊ, पिता और आप-तीनों भाई-भाई हैं। मैं अब तक तो आप तीनों को भाई ही समझता हूँ।
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आप तीनों भाई आपस में चाहे लड़ें या प्रेम से रहें, मुझे बीचे में क्यों तंग करते है? आप तो आज लड़ रहे हैं, कल फिर सभी भाई एक हो जायंगे। मैं तो जैसा उनका लड़का वैसा ही आपका लड़का। मैं तो आपको भी अपना बड़ा ताऊ ही समझता हूँ। आप कोई अनपढ़ तो हैं ही नहीं, सभी बातें जानते हैं। मेरे साथ ऐसा बर्ताव आपको शोभा नहीं देता।'
गुलाब के समान खिले हुए मुख से स्नेह और सरलता के ऐसे शब्द सुनकर चौधरी का कठोर हृदय भी पसीज गया। उसने अपनी मोटी-मोटी भुजाओं से रघुनाथदास जी को छाती से लगाया और आँखों में आंसू भरकर गद्गद कण्ठ से कहने लगा- 'बेटा ! सचमुच धन के लोभ से मैंने बड़ा पाप किया।
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तुम तो मरे सगे पुत्र के समान हो, आज से तुम मेरे पुत्र हुए। मैं अभी राजमन्त्री से कहकर तुम्हें छुड़वाये देता हूँ। तुम्हारे ताऊ और पिता जहाँ भी हों उन्हें खबर कर देना कि अब डर करने का कोई काम नहीं है। वे खुशी से अपने घर आकर रहें।'
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यह कहकर उन्होंने राजमन्त्री से रघुनाथदास जी को मुक्त करा दिया। वे अपने घर आकर रहने लगे। अब तो उन्हें इस संसार का यथार्थ रूप मालूम पड़ गया। अब तक वे समझते थे कि इस संसार में सम्भवतया थोड़ा-बहुत सुख भी हो, किन्तु इस घटना से उन्हें पता चल गया कि संसार दु:ख और कलह का घर है।
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कहीं तो दीनता के दु:ख से दु:खी होकर लोग मर रहे हैं, कामपीड़ित हुए कामीजन कामिनियों के पीछे कुत्तों की भाँति घूम रहे हैं। कहीं कोई भाई से लड़ रहा है, तो किसी जगह पिता-पुत्र से कलह हो रहा है। कहीं किसी को दस-बीस गांवों की ज़मींदारी मिल गयी है या कोई अच्छी राजनौकरी या राजपदवी प्राप्त हो गयी है तो वह उसी के मद में चूर हुआ लोगों को तुच्छ समझ रहा है।
(क्रमशः)

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