मंगलवार, 5 मई 2020

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*दादू नाम निमित रामहि भजै,*
*भक्ति निमित भजि सोइ ।*
*सेवा निमित सांई भजै, सदा सजीवन होइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *अर्चना भक्ति*
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एक समय राजा इन्द्रद्युम्न ने महर्षि लोमश से पूछा - 'मुने ! यह दीर्धायु आपको कैसे प्राप्त हुई ?' लोमेश - राजन ! मैं पूर्वकाल में एक दरिद्र शूद्र था । एक दिन दोपहर के समय जल के भीतर मैंने एक बहुत बड़ा शिवलिंग देखा । भूख से मेरे प्राण सूखे जा रहे थे । उस जलाशय में स्नान करके मैंने कमल के फूलों से उस शिवलिंग की पूजा की और आगे चल दिया । 
भूख के कारण मार्ग में ही मेरी मृत्यु हो गई । दूसरे जन्म में मैं ब्राह्मण के घर जन्मा । शिवलिंग की पूजा के प्रताप से मुझे पूर्व जन्म की बातों का स्मरण रहने लगा । मैंने जान बुझ कर मूकता धारण कर ली । 
पिताजी की मृत्यु बाद संबंधियों ने मुझे गूंगा जान कर त्याग दिया । अब मैं रात दिन शिवजी की आराधना करने लगा । सौ वर्ष बीत गये तब भगवान शिव शंकरजी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर मुझे इतनी बड़ी आयु दी थी । इससे सूचित होता है कि पूजा से दीर्धायु भी मिलती है ।
दीर्ध आयु भी मिलत है, पूजा से सत बात ।
लोमेश चिर जीवी भये, पूजा है प्रख्यात ॥१४५॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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