शुक्रवार, 29 मई 2020

= *कृपण का अंग १२०(९/१२)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू बूड रह्या रे बापुरे, माया गृह के कूप ।*
*मोह्या कनक अरु कामिनी, नाना विधि के रूप ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कृपण का अंग १२०*
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सूम सगा१ नहिं जीव का, आपा पर न सनेह ।
रज्जब दुख दे देह को, सुकृत करै न गेह ॥९॥
कृपण अपने जीव का भी संबन्धी१ नहीं होता अर्थात हित नहीं चाहता । अपने पराये दोनों के ही प्रेम नहीं रखता, अपने शरीर को भी दुख देता है, घर में कभी सुकृत तो करता ही नहीं ।
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सूम समाया सांकड़े१, सदा जतन२ सब ओड़ि३ ।
रज्जब रोक्या ॠद्धि४ का, रह्या सु तन मन मोड़ि ॥१०॥
कृपण संकुचित१ स्थान में समाया हुआ रहता है, सदा सब ओर३ से धन का यत्न२ रखता है, वह माया४ की आसक्ति से रुका हुआ अपने तन मन को माया की ओर मोड़ करके ही रखता है ।
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सूम समाई१ का धणी२, बहु जरणा३ घट४ मांहि ।
जन रज्जब रिधि५ के यतन६, लड़ै सु बोले नाँहिं ॥११॥
कृपण सहनशक्ति१ का स्वामी२ होता है, उसके अंतकरण४ में बहुत क्षमा३ रहती है, माया५ कमाने के लिये साधनों६ के लिये लड़ता है किन्तु माया खर्चने के लिये बोलता भी नहीं ।
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रज्जब शुक्र१ सु सूम व्है, बैठा झारी माँहिं ।
नरपति फोड्या नैन गुरु, पै२ पुण्य छोड्या नाँहिं ॥१२॥
शुक्राचार्य१ कृपण बनकर जल की झारी में जा बैठा, राजा बलि ने तृण से गुरु का नेत्र भी फोड़ डाला किन्तु३ उन्होंने पुण्य के संकल्प के लिये जल को नहीं छोड़ा कृपण वृत्ति ऐसी ही होती है ।
(क्रमशः)

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