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*दादू सम कर देखिये, कुंजर कीट समान ।*
*दादू दुविधा दूर कर, तज आपा अभिमान ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ दया निर्वैरता का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४७. नीलाचल में सनातन जी*
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वृन्दावनात् पुन: प्राप्तं श्रीगौर: श्रीसनातनम्।
देहपातादवन् स्नेहाच्छुद्धं चक्रे परीक्षया॥[१]
{[१] श्री वृन्दावन लौटे हुए श्री सनातन को महाप्रभु श्री गौरांग देव ने श्री जगन्नाथ जी के रथ के चक्र के नीचे दबकर मरने के विचार से हटाकर और कठिन परीक्षा करके शुद्ध बना दिया। (श्री चैतन्यचरि. अ. ली. ४/१)}
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श्री रूप तो सम्पत्ति की व्यवस्था करने के निमित्त गौड़ देश में ठहरे हुए हैं, अब इनके भाई श्री सनातन जी का समाचार सुनिये। सनातन जी ने 'मथुरामाहात्म्य' हस्तगत करके उसी के अनुसार व्रजमण्डल के समस्त तीर्थो की यात्रा की।
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यात्रा के अनन्तर उन्हें अपने भाई से भेंट करने तथा प्रभु के दर्शनों की इच्छा हुई। अपने भाइयों का समाचार जानने के लिये वे व्रज से नीलाचल की ओर चल पड़े। गौड़ तो उन्हें जाना ही नहीं था, क्योंकि ये जेलर को इस बात का वचन दे आये थे। अत: प्रयाग से काशी होते हुए झाड़ीखण्ड के विकट रास्ते से ये जंगल के कण्टकाकीर्ण भयंकर पंथ के ही पथिक बने।
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रास्ते में जंगल की झाड़ियों की विषैली वायु लगने से इनके सम्पूर्ण अंग में भंयकर खुजली हो गयी। खुजली पक भी गयी और उससे पीब बहने लगा। जैसे-तैसे ये पुरी में पहुँचे। पुरी में ये कहाँ ठहरें? पहले कभी आये नहीं थे।
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इतना उन्होंने सुन रखा था कि प्रभु कहीं मन्दिर के ही समीप में रहते हैं, किन्तु यवनों के संसर्गी होने के कारण ये अपने को मन्दिर के समीप जाने का अधिकारी ही नहीं समझते थे, इसलिये ये महात्मा हरिदास जी का स्थान पूछते-पूछते वहाँ पहुँचे। हरिदास जी इन्हें देखते ही खिल उठे इनकी यथो योग्य अभ्यर्चना की।
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सनातन प्रभु के दर्शनों के लिये बड़े उत्सुक हो रहे थे किन्तु मन्दिर के समीप न जाने के लिये विवश थे, तब हरिदास जी ने इन्हें धैर्य बंधाते हुए कहा- 'आप घबड़ाइये नहीं, प्रभु यहाँ नित्य प्रति आते हैं, वे अभी आते ही होंगे।' इतने में ही दोनों ने श्री हरि के मधुर नामो का संकीर्तन करते हुए प्रभु को दूर से आते हुए देखा।
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प्रभु को देखते ही एक ओर हटकर श्री सनातन जी भूमि पर लोटकर साष्टांग प्रणाम करने लगे। हरिदास जी ने कहा- 'प्रभो ! सनातन साष्टांग कर रहे हैं।' 'सनातन यहाँ कहां।' इतना कहते हुए प्रभु जल्दी से सनातन का आलिंगन करने के लिये दौडे़।
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प्रभु को अपनी ओर आते देखकर सनातन जी जल्दी से उठकर एक ओर दौडे़ और कातर स्वर से कहते जाते थे- 'प्रभो मैं नीच एक तो वैसे ही अधम, नीच और यवन-संसर्गी था, तिस पर भी मेरे सम्पूर्ण शरीर में खाज हो रही है। आप मेरा स्पर्श न करें।' किन्तु प्रभु कब सुनने वाले थे।
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जल्दी से दौड़कर उन्होंने बलपूर्वक सनातन जी को पकड़ लिया और उनका गाढ़ालिंगन करते हुए वे कहने लगे- 'आज हम कृतार्थ हो गये। सनातन के शरीर की सुन्दर सुगन्धित को सूंघकर हमारे लोक-परलोक दोनों ही सुधर गये।' 'सचमुच प्रभु ने सनातन जी के दिव्य शरीर में की खाज मे से एक प्रकार की दिव्य सुगन्धित का अनुभव किया।
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सनातन जी संकोच के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो ये। महाप्रभु की अपार अनुकम्पा के भार से दबे हुए वे विवश होकर पृथ्वी की ओर दखने लगे। महाप्रभु की अहैतु की कृपा के स्मरण से उनका हृदय पिघल रहा था और वह पानी बन-बनकर आँखों के द्वारा निकल कर प्रभु के काषाय रंग वाले वस्त्रों को भिगो रहा था।
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थोड़ी देर के अनन्तर प्रभु वहीं एक आसन पर बैठ गये। नीचे सिर किये हुए भूमि पर सनातन जी और हरिदास जी बैठ गये। प्रभु ने धीरे-धीरे रूप के आने का और उनके मिलने आदि का सभी वृत्तान्त सुना दिया। इसी प्रसंग में प्रभु ने श्री अनूप के परलोकगमन का समाचार भी सुना दिया।
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भाई के वैकुण्ठवास का समाचार सुनकर वीतराग महात्मा सनातन जी का भी हृदय उमड़ आया। वे अपने अश्रुओं के प्रवाह को रोक नहीं सके। प्रभु के कमल मुख पर भी विषण्णता के भाव प्रतीत होने लगे।
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प्रभु ने धीरे-धीरे भर्राई हुई आवाज से कहा- 'सनातन ! तुम्हारे भाई ने सदगति पायी। वे परम भागवत पुरुषों के लोक में परमानन्द-सुख का अनुभव करते होंगे, उनसे बढ़कर सौभाग्यशाली हो ही कौन सकता है, जिन्होंने देहत्याग के पूर्व अपना घरबार त्याग दिया, व्रजमण्डल के सभी तीर्थो की यथाविधि यात्रा की और अन्तिम समय में अपने परम भागवत गुरु स्वरूप जयेष्ठ भ्राता श्री रूपजी की गोद में सिर रखकर भगवती भागीरथी के रम्य तट पर इस नश्वर शरीर को त्याग दिया और वैकुण्ठवासी बन गये, उन महाभाग के निमित्त तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। ऐसी मृत्यु के लिये तो इन्द्रादि देवता भी तरसते हैं।'
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रुंधे हुए कण्ठ से आंसू पोंछते हुए श्री सनातनजी ने कहा- 'प्रभो ! मैं उन महाभाग के शरीर के लिये रुदन नहीं कर रहा हूँ। वे तो नित्य हैं, शाश्वत धाम में जाकर अपने इष्टदेव श्री सीता-राम जी के चरणाश्रित बन गये होंगे, किन्तु मुझे इसी बात का सोच हो रहा है कि अन्तिम समय मैं उनके दर्शन नहीं कर सका। मैं अभागा उनके निधन काल के दर्शनों से वंचित ही रहा।'
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प्रभु ने करूण स्वर में कहा-' रूप कहते थे, उनकी निष्ठा अलौकिक थी, अन्तिम समय में उन्होंने श्री सीताराम जी का ध्यान और स्मरण करते हुए प्रसन्नता पूर्वक ही शरीर त्याग किया।'
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सनातन जी ने पश्चात्ताप के स्वर में कहा- प्रभो ! मैं उनकी निष्ठा आपके सम्मुख क्या बताऊँ। कहने को तो वे हमारे छोटे भाई थे, किन्तु निष्ठा में वे हम दोनों से बढ़कर थे। उनकी-जैसी निष्ठा मैनें आज तक किसी में भी नहीं देखी। हमारी तो निष्ठा ही क्या, उनके सामने हमारी निष्ठा तो नहीं के ही समान है। वे सदा हमारे साथ रहते और तीनों ही मिलकर श्रीमद्भागवत की कथा सुना करते। उनके इष्टदेव श्री सीता-राम जी थे।
(क्रमशः)

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