सोमवार, 4 मई 2020

= *संयम कसौटी का अंग ११६(३७/४०)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू सांई कारण मांस का, लोही पानी होइ ।*
*सूखे आटा अस्थि का, दादू पावै सोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*संयम कसौटी का अंग ११६*
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रज्जब संकट मधि संतोष व्है, विपति बीच विश्वास ।
दुख बिन सुख लहिये नहीं, समझ सनेही दास ॥३७॥
दु:ख होने के पश्चात ही संतोष होता है, विपत्ति आने पर ही विश्वास होता है । हे प्रेमी भक्त ! यह भली प्रकार समझ ले दु:ख बिना सुख मिलता ही नहीं ।
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फाके शेख फरीद के, करसी कौन फकीर ।
रज्जब रजमा१ यों२ लिया, जाहिर३ होय जहीर४ ॥३८॥
माता के उपदेश से प्रभु प्राप्ति के लिये शेख फरीद ने उपवास किये थे, वैसे अब कौन फकीर करेगा ? इस२ प्रकार साधन बल१ प्राप्त किया तभी प्यारे४ प्रभु उनके लिये प्रकट३ हुये थे ।
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प्रहलाद कसौटी१ पूरि२ ली, देत हु भानी३ भोल४ ।
रज्जब अडिग सु अग्नि में, निकस्या नाम अडोल५ ॥३९॥
प्रहलाद ने पूर्ण२ रूप से कष्ट१ सहन किया, फूस की अग्नि४ देते ही भगवान ने उसकी जलाने की शक्ति नष्ट३ करदी । प्रहलाद अग्नि में भी अडिग रहे और नाम चिन्तन में भी स्थिर५ निकले, क्षण भर के लिये भी नाम को नहीं छोड़ा ।
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रज्जब अज्जब१ काम में, मोत लही मनसूर ।
यूं२ अल्लह आशिक३ हुआ, जाहिर४ जगत जहूर५ ॥४०॥
सूफी संत मंसूर ने अभेद१ निष्ठा रूप अदभुत काम में मृत्यु को स्वीकार किया, मृत्यु के भय से अपनी निष्ठा को नहीं छोड़ा, इस२ प्रकार ईश्वर का प्रेमी३ हुआ । और जगत में प्रगट४ रूप विजय५ प्राप्त की ।
(क्रमशः)

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