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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ १७३/१७६*
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अलह बीम अरमह मंहि, अदब आदि सब ठांम ।
कहि जगजीवन आसिक नूरी, दिल मंहि रहीम रांम ॥१७३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि इस सृष्टि के परमात्मा ही आधार हैं। और इसके लिये उन्होंने मर्यादा बनायी है जो सर्वत्र व्याप्त है। जो पमात्मा के सच्चे आशिक हैं, भक्त हैं, उनके मन में यह तेज सदा प्रभु स्मरण के रुप में व्यापता है चाहे वह राम रुप हो या रहीम रुप हो।
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कहि जगजीवन कोह थै, काह भये गलि चाहि ।
अल्लह आसिक ऊबरै, दीन दुनी तजि दाहि ॥१७४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि इस संसार रुपी गुफा से गंदगी की कामना या विकार युक्त इच्छा से क्या उपलब्धि मिलेगी ? उद्धार तो प्रभु भक्तों का ही होगा वे ही संसार के ताप त्याग कर पार पायेंगे।
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सुखन पाक बीमार तन, बमरहै दिल मांहि ।
कहि जगजीवन हरदम अल्लह, आसिक भूलै नांहि ॥१७५॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि पवित्र देह में ही आत्मा सुखी रहती है। चाहे बाह्य शरीर कैसा भी ग्रस्त हो। अगर उसमें लगन है तो वह अपने प्रभु को भूलता नहीं है।
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माइ अैसी मालिक मिहर, आसिक अल्ल्ह रांम ।
कहि जगजीवन कीन्हां अंत, नूर पिवै भजि नांम ॥१७६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि, हे प्रभु ऐसी कृपा करें कि यह जीव स्मरण रत रहै और इसी मे लय हो कर अंत में उस नाम के तेज में ही समा जाये।
(क्रमशः)

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