शुक्रवार, 29 मई 2020

*४. विरह कौ अंग ~ २६९/२७२*

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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २६९/२७२*
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हरदम हरि हा हा करूँ, सुमिरूँ सांसै सांस६ ।
उर भरि आवै मिल्न कों, सु कहि जगजीवनदास ॥२६९॥
(६. सांसैं सांस--प्रतिश्वास)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हर समय विरह उसांसे भरते रहते हैं और हर सांस में सिमरण करते रहते हैं, हृदय प्रभु से मिलने को आतुर हो उठता है ऐसा संत भाव है।
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सरोज सुपनि आवत ह्रिदै, बिरही जन कूं रोज ।
कहि जगजीवन नैंन भरि, निरखि पिछांणत खोज ॥२७०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु रोज स्वप्न में आते हैं। विरहीजन जी भर कर देखते हैं और प्रभु के पद चिन्हों को देखकर विरही जन  जान जाते हैं कि ये जो स्वप्न में आये हैं ये प्रभु ही हैं।
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खंडित रोज विकार का, रोइ रोइ हंसि दे भूल ।
कहि जगजीवन दरद सोइ, अंगि धरा इक सूल ॥२७१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विकारों को बढने न दे नित्य खण्डित करें और अपने कृत कर्मों पर पश्चाताप कर रोयें, हसंना भूल जायें । संत कहते हैं कि प्रभु प्रेम की पीड़ा तो वह ही है कि मानो देह में चुभा कांटा सालता हो, पीड़ा देता हो।
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कहि जगजीवन गगन मंहि, अथग प्रेम का ताल७ ।
रांम क्रिपा भरि ऊलटै, नैंना चालै खाल८ ॥२७२॥
(७. अथाग प्रेम का ताल--अगाध प्रेम सरोवर)  
(८. नैंना चालै खाल--नेत्रों से प्रबल अश्रुधारा बहना)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस उन्मुक्त गगन में प्रेम का विशाल सरोवर है। जब प्रभु दया करते हैं तो हमारे नैत्रों से प्रेमाश्रु बह निकलते हैं।
(क्रमशः)

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