सोमवार, 18 मई 2020

*१४३. स्‍वामी प्रकाशानन्‍द जी मन से भक्‍त बने*

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*कै यहु तुम को सेवक जानैं,*
*कै यहु रचले मन के मानैं ॥*
*कै यहु तुम को सेवक भावै,*
*कै यहु रचले खेल दिखावै ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २३४)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४३. स्‍वामी प्रकाशानन्‍द जी मन से भक्‍त बने*
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प्रभु ने संकोच युक्‍त विवशता के स्‍तर में कहा- 'भैया इतने बड़े-बड़े महात्‍माओं के बीच में मुझे क्‍यों ले जाते हो? मैं वहाँ क्‍या करूँगा? तम्‍हारे घर किसी दिन भिक्षा कर आऊँगा।' पैर पकड़े अत्‍यन्‍त ही कातर वाणी से रोते-रोते उन महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन ने कहा- 'प्रभो ! मैंने सारा आयोजन तो केवल आपके ही लिये किया है। आप न पधारेंगे तो मेरा सभी व्‍यर्थ हो जायगा। .
आप इस दीन-हीन कंगाल के ऊपर कृपा अवश्‍य करें और अपनी पद-धूलि से इस अधम के सदन को पावन कर इसे कृतार्थ करें। उन सज्‍जन की प्रार्थना का सभी ने समर्थन किया ! भक्‍तवत्‍सल प्रभु सहमत हो गये और वे चलने के लिये तैयार हुए। प्रभु सनातन जी के कन्‍धे पर हाथ रखे हुए थे। पीछे-पीछे चन्‍द्रशेखर, तपन मिश्र तथा दो-चार भक्त और चल रहे थे।
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घर के दरवाजे पर पहुँचकर प्रभु ने सनातन जी के कन्‍धें से हाथ हटा लिया, वे नीची दृष्टि किये हुए धीरे-धीरे धर में पहुँचे। सेवक जल लेकर फौरन प्रभु के पैरों को धोने के लिये बढ़ा। प्रभु ने संकोच से पैरों को खींचते हुए स्‍वयं ही पैर धो लिये और वहीं अस्‍त-व्‍यस्‍त भाव से मोरी के पास ही कीच में बैठ गये।
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संन्‍यासी-मण्‍डली में सन्‍नाटा छा गया। शास्‍त्रार्थ करना सब भूल गये। सभी एकटक भाव से प्रभु की ओर देखने लगे। तीस-बत्तीस वर्ष की अवस्‍था का एक परम तेजस्‍वी रूपलावण्‍य युक्‍त युवक संन्‍यासी बिना किसी दिखावे के चुपचाप मोरी के पास बैठ गया है, इस बात से सभी को परम आश्‍चर्य हुआ।
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प्रभु का शरीर बड़ा ही सुकुमार था, उनके दाढ़ी-मूंछें बहुत ही कम निकली थीं, वे एक दम मुड़ी हुई थीं, इसलिये देखने में वे सोलह वर्ष के-बालक प्रतीत होते थे। उनके गुलाब की पंखुडि़यों के समान दो छोटे-छोटे अरुण रंग के समान ओष्‍ठ दूर से ही अपनी गाढ़ी लालिमा के कारण चमक रहे थे। प्रभु बिना किसी की ओर देखे चुपचाप सिर झुकाये हुए बैठे थे।
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उपस्थित सभी संन्‍यासी कोई उंगली के इशारे से, कोई भृकुटी के संकेत से, कोई बहुत ही हल की आवाज से प्रभु के ही सम्‍बन्‍ध में कुछ कहने लगे। प्रकाशानन्‍द जी इनके तेज, रूप-लावण्‍य, नम्रता, शालीनता और प्रभाव को ही देखकर समझ गये कि ये ही महाप्रभु चैतन्‍य देव हैं। किन्‍तु सबके सामने अपनी प्रतिष्‍ठा को बनाये रखने के निमित्त उन्‍होंने गृहपति उन महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन से पूछा- 'ये स्‍वामी जी कहाँ से आये हैं? उन्‍होंने धीरें से कहा- 'ये वे ही बंगाली स्‍वामी जी हैं, जिनके सम्‍बन्‍ध में मैंने आपसे कहा था।'
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प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए प्रकाशानन्‍द जी ने कहा- 'ओहो ! ये ही श्रीकृष्‍णचैतन्‍य भारती हैं। इनकी प्रशंसा तो हम बहुत दिनों से सुन रहे हैं। आज इनके खूब दर्शन हुए। (प्रभु को लक्ष्‍य करके) आप वहाँ क्‍यों बैठ गये, यहाँ आइये। आपका वहाँ बैठना शोभा नहीं देता।
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प्रभु ने सिर को नीचे किये हुए धीरे से उत्‍तर दिया- 'भगवन ! मैं हीन सम्‍प्रदाय वाला हूँ, भला आपके बराबर कैसे बैठ सकता हूँ। यहीं ठीक बैठा हूँ। प्रकाशानन्‍द जी प्रभु की सरलता और नम्रता को देखकर एक दम मन्‍त्र-मुग्‍ध से हो गये। जब दो-तीन बार कहने पर भी प्रभु अपने स्‍थान से नहीं उठे तब तो प्रकाशानन्‍द जी स्‍वयं उठकर गये और प्रभु का हाथ पकड़कर उन्‍हें अपने सामने ही गद्दी पर बिठा लिया।
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अत्‍यन्‍त ही संकोच के साथ प्रभु विवशता-सी दिखाते हुए सिकुड़कर बैठ गये। प्रभु धीरे-धीरे भगवन्‍नामों का उच्‍चारण कर रहे थे। भगवन्‍नाम-उच्‍चारण से जिस प्रकार वायु लगने से कमल की पंखुडियाँ हिलती हैं, उसी प्रकार उने बिम्‍बाफल के समान दोनों अधर हिल रहे थे।
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कुछ बातें करने की इच्‍छा से प्रसंग छेड़ते हुए प्रकाशानन्‍द जी ने कहा- 'स्‍वामी जी ! मैं आपसे एक शिकायत करना चाहता हूँ; आप पहले आये और मुझसे बिना ही मिले चले गये। साधुओं के सम्‍बन्‍धी साधु ही होते हैं। वाराणसी में आपका एक मठ था, उसमें न आकर आप गृहस्थियों के यहाँं ठहरे और मुझसे मिले भी नहीं। मालूम पड़ता है आप मुझे अपना नहीं समझते।'
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प्रभु ने इस बात का कुछ भी उत्‍तर नहीं दिया। उसी समय एक चुलबुल-से युवक संन्‍यासी ने धीरे से कहा-‘मौनं स्‍वीकृतिलक्षणम्‘॥[१]
([१] चुप हो जाना स्वीकृति का लक्षण है।)
इस बात के सुनते ही संन्‍यासी मण्‍डली में जोर का कह कहा मच गया। सबके चुपचाप हो जाने पर प्रभु ने धीरे-धीरे लज्‍जा के स्‍वर में कहा- ‘आप गुरुजनों के सामने मैं क्‍या मुख लेकर आंऊ। अपने में इतनी योग्‍यता नहीं समझी कि आपके दर्शन कर सकूं, इसी संकोच से नहीं आया।’
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बात बदलते हुए प्रकाशानन्‍द जी ने कहा– ‘तुमने कटवा के केशव भारती से ही संन्‍यास लिया है न? प्रभु ने धीरे से कहा–‘जी हां, वे ही मेरे दीक्षागुरु हैं’ प्रकाशानन्‍द जी ने कुछ रुक-रुककर कहा –‘एक बात पूछना चाहता हूँ, तुम बुरा न मानो तो पूछूं।
(क्रमशः)

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