🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
.
*॥ माया ॥*
*माया मति चकचाल कर, चंचल कीये जीव ।*
*माया माते मद पिया, दादू बिसर्या पीव ॥१०१॥*
माया का स्वभाव चंचल होने के कारण यह माया जीवों के मन को विषयों का मोह दिखाकर चंचल बना देती है । जीव माया का रस पीकर उन्मत्त हुए परमात्मा को भी भूल जाता है ।
श्रीमद्भागवत में कहा है कि- यह जीव माया से रचित स्त्री, सुवर्ण, भूषण, वस्त्र आदि द्रव्यों में लुप्त होकर उपभोग दृष्टि उनमें प्रवृत्त होता हुआ पतंग की तरह बुद्धि के नष्ट हो जाने से स्वयं ही नष्ट हो जाता है ।
.
*॥ आन लगनि बिभचार ॥*
*जने जने की राम की, घर घर की नारी ।*
*पतिव्रता नहीं पीव की, सो माथै मारी ॥१०२॥*
अहो ! यह भगवान् की माया बहुत ही विलक्षण है । व्यभिचारिणी नारी की तरह घर-घर घूमती रहती है । इसलिये सन्तों ने इसको त्याग दिया, क्योंकि चंचल स्वभाव होने के कारण एक जगह नहीं ठहरती है । जैसे पतिव्रता एक जगह रहती है ।
.
*जन जन के उठ पीछे लागै, घर घर भ्रमत डोलै ।*
*ताथैं दादू खाइ तमाचे, माँदल दुहुँ मुख बोलै ॥१०३॥*
यह माया हर मनुष्य के पीछे दौड़ती है । घर-घर में भटकती रहती है । अतः जगह-जगह मृदंग की तरह प्रताडित होती है । अर्थात् लक्ष्मी के आने पर सन्त उसको ताड़ना देते हैं कि हमारे पास क्यों आई हो हम भगवान् के प्यारे हैं, अतः हम तुमको नहीं चाहते । भाव यह है कि सन्त लक्ष्मी के आने पर प्रसन्न नहीं होते और जाने पर दुःख नहीं मानते ।
नीतिशतक में लिखा है कि- आज ही चाहे मृत्यु हो चाहे दिनान्तर में ‘लक्ष्मी’ आये चाहे जाए परन्तु धैर्यशील पुरुष अपने न्यायमार्ग से विचलित नहीं होते हैं ।
.
*॥ विषय विरक्तता ॥*
*जे नर कामिनी परहरैं, ते छूटैं गर्भवास ।*
*दादू ऊँधे मुख नहीं, रहैं निरंजन पास ॥१०४॥*
जिन महात्माओं ने लक्ष्मी(माया) का परित्याग कर दिया वे मुक्त हो गये । फिर संसार में नहीं आते । किन्तु प्रभु का भजन करके ब्रह्मरूप हो जाते हैं ।
लिखा है कि- जो पूर्ण ज्ञान तथा परम आनन्दरूप तथा विश्व का कल्याण करने वाले परमात्मा को अव्यभिचारिणी भक्ति से भजता है वह भगवान् के प्रसाद से ज्ञानाग्नि के द्वारा विषयरूप कर्मों को जलाकर अमृतस्वरूप विष्णुपद को प्राप्त कर लेता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें