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*साचा सतगुरु सोधि ले, साचे लीजे साध ।*
*साचा साहिब सोधि करि, दादू भक्ति अगाध ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*सच्चिदानन्द ही गुरु और मुक्तिदाता है*
विजय- महाराज, ब्राह्मसमाज में जो उपदेश दिए जाते हैं, क्या उनसे लोगों का उद्धार नहीं होता ?
श्रीरामकृष्ण- मनुष्य में वह शक्ति कहाँ कि वह दूसरे को संसारबन्धन से मुक्त कर सके? यह भुवनमोहिनी माया जिनकी है, वे ही माया से मुक्त कर सकते हैं । सच्चिदानन्द गुरु को छोड़ और दूसरी गति नहीं है । जिसको ईश्वर-दर्शन नहीं हुआ, उनका आदेश नहीं मिला, जो ईश्वर की शक्ति से शक्तिशाली नहीं है, उसकी क्या मजाल कि जीवों का भवबन्धन-मोचन कर सके ?
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“मैं एक दिन पंचवटी के निकट झाउतल्ले की ओर जा रहा था । एक मेंढक की आवाज सुनायी दी-जान पड़ा कि साँप ने पकड़ा है । काफी देर बाद जब लौटने लगा तब भी उस मेंढक की पुकार शुरू ही थी । बढ़कर देखा तो दिखायी दिया की के कौड़ियाला साँप उस मेढ़क को पकड़े हुए है- न छोड़ सकता है, न निगल सकता है उस मेढ़क की भी भवव्यथा दूर नहीं हो रही है । तब मैंने सोचा कि यदि कोई असल साँप पकड़ता तो तीन ही पुकार में इसको चुप हो जाना पड़ता । इस कौड़ीयाले ने पकड़ा है, इसीलिए साँप की भी दुर्दशा है और मेढ़क की भी !
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“यदि सद्गुरु हो तो जीव का अहंकार तीन ही पुकार में दूर होता है । गुरु कच्चा हुआ तो गुरु की भी दुर्दशा है और शिष्य की भी । शिष्य का अहंकार दूर नहीं होता, न उसके भवबन्धन की फाँस ही कटती है । कच्चे गुरु के पल्ले पड़ा तो शिष्य मुक्त नहीं होता ।
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(६)अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते । (गीता, ३/२७)
*माया या अहंबुद्धि का नाश और ईश्वर-दर्शन*
विजय- महाराज, हम लोग इस तरह बद्ध क्यों हो रहे हैं? ईश्वर को क्यों नहीं देख पाते ?
श्रीरामकृष्ण- जीव का अहंकार ही माया है । यही अहंकार कुल आवरणों का कारण है । ‘मैं’ मरा कि बला टली । यदि ईश्वर की कृपा से ‘मैं अकर्ता हूँ’ यह ज्ञान हो गया तो वह मनुष्य तो जीवन्मुक्त हो गया । फिर कोई भय नहीं ।
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“यह माया या ‘अहं’ मेघ की तरह है । मेघ का एक छोटा सा ही टुकड़ा क्यों न हो, पर उसके कारण सूर्य नहीं दीख पड़ते । उसके हट जाने से ही सूर्य दीख पड़ते हैं । यदि श्रीगुरु की कृपा से एक बार अहंबुद्धि दूर हो जाय तो फिर ईश्वर के दर्शन होते हैं ।
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“सिर्फ ढाई हाथ की दूरी पर श्रीरामचन्द्र हैं, जो साक्षात् ईश्वर हैं; पर बीच में सीतारुपिणी माया का पर्दा पड़ा हुआ है, इसी कारण लक्षमणरूपी जीव को ईश्वर के दर्शन नहीं होते । यह देखो तुम्हारे मुँह के आगे मैं इस अँगौछे की ओट करता हूँ । अब तुम मुझे नहीं देख सकते । पर हूँ मैं तुम्हारे बिलकुल निकट । इसी तरह ओरों की अपेक्षा भगवान् निकट हैं, परन्तु इस माया-आवरण के कारण तुम उनके दर्शन नहीं पाते ।
(क्रमशः)

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