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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ १६५/१६८*
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रांम नांम ए सहंसक्रित१२, प्राक्रित१३ परम प्रकास ।
रांम नांम ए जोग हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥१६५॥
१२. सहंसक्रित-संस्कृत (वेदभाषा) ।
१३. प्राक्रित-प्राकृत (=लोकभाषा) ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि संस्कृत, प्राकृत भाषाओं में भी जो महिमा कही गयी है वह भगवन्नाम की ही है। संत कहते हैं कि, राम नाम जपना राम की शरण ही कहा जाता है।
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नख सिख भरि सुमिरन करै, अंतर बिरह जगाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, राखै कंठ लगाइ ॥१६६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिस जीव के नख से शिखा यानि चोटी तक स्मरण ही हो और अतंर में विरह हो, ऐसे जीव को प्रभु कंठ से लगा कर रखते हैं।
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छिन मंहि मिलि जाउ इसौ मन, चित मंहि एही चाह ।
कहि जगजीवन गोदि थैं, धरणि धरै बिच बांह ॥१६७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं की है प्रभु आप आकर मिल जायें क्षणभार के लिए भी विलग न हों, मन में यह ही इच्छा है। हे प्रभु, अपनी संरक्षण रुपी गोद से ही इस धरा पर उतारना या जन्म देना।
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रो रो रोयाँ रस रहै, रोयाँ रीझै रांम ।
कहि जगजीवन हंसै न रोवै, दहम देह निज ठांम ॥१६८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि, रोने से ही रामानंद मिलता है व रोने से ही राम द्रवित होते हैं । संत कहते हैं, जीवात्मा जब प्रभु प्रेम में अपनी देह क्षीण करती है तो प्रभु यथा स्थान ही मिल जाते हैं।
(क्रमशः)

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