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*दादू झूठा बदलिये, साच न बदल्या जाइ ।*
*साचा सिर पर राखिये, साध कहै समझाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*साँच निर्भय का अंग ११८*
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रज्जब रहे न रोपि१, झूठ चल्या सुन साच भय ।
ज्यों उडगण२ गये गोपि३, उदय होत आदित्य के ॥९॥
जैसे सूर्य उदय होते ही तारे२ छिप३ जाते हैं वैसे ही झूठ, सत्य का नाम सुनकर भय से चल पड़ता है जम१ कर नहीं रह सकता ।
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रज्जब एकल१ सूर२ सत्य, झूठे नव लख तार ।
पलक माँहिं पैमाल३ ह्वै, दीसै नहीं लगार४ ॥१०॥
सत्य एक१ सूर्य२ के समान है और झूठ नव लाख तारों के समान है, जैसे सूर्य के उदय होते ही तारे छिप जाते हैं, किंचित४ मात्र भी नहीं दीखते, वैसे ही सत्य के आने पर मिथ्या नष्ट३ हो जाता है ।
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सास सजादे१ झूठ को, युग युग बारम्बार ।
रज्जब रोस२ न कीजिये, ता में फेर न सार ॥११॥
प्रतियुग में बारम्बार सत्य ही मिथ्या को दण्ड१ देता है, इस बात पर क्रोध२ न करें यह सार बात है इसमें परिवर्तन नहीं हो सकता ।
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प्रत्यक्ष पेकै१ सम नहीं, सुन स्वप्ने की कोड़ि२ ।
रज्जब सत्य असत्य यूं, देखि जीव में जोड़ि ॥१२॥
हे प्राणी ! सुन प्रत्यक्ष के एक पैसे१ के समान भी स्वप्ने के कोटि२ रुपये नहीं हो सकते, ऐसे ही सत्य असत्य की जोड़ी है, असत्य सत्य के साथ समान नहीं हो सकता, तू स्वयं भी अपने मन में देख सकता है ।
(क्रमशः)

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