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*वाद विवाद न कीजे लोई,*
*वाद विवाद न हरि रस होई ।*
*मैं मैं तेरी मांनै नाँहीं हीं,*
*मैं तैं मेट मिलै हरि मांहीं ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २७९)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण का बान देखना*
श्रीरामकृष्ण इसी भाव में बैठे हैं, इसी समय एक आदमी ने आकर समाचार दिया कि बान* आ रहा है । श्रीरामकृष्ण, राखाल, मास्टर सभी लोग बान देखने के लिए पंचवटी की ओर दौड़ने लगे । पंचवटी के नीचे आकर सभी बान देख रहे हैं । दिन के करीब साढ़े दस बजे का समय होगा । एक नौका की स्थिति को देख श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “देखो, देखो, उस नाव की न जाने क्या दशा होगी !”
{*बंगाल के उपसागर में ज्वार आने पर उसका बहुत सा जल गंगा में घुस जाता है और वह विशाल जलराशि बड़ी ऊँची लहर के रूप में जोरों से गर्जना करती हुई गंगा के पृष्ठभाग पर से उलटी दिशा में वेग के साथ बढ़ने लगती है । इसे ‘बान’ कहते हैं । (प्र.)}
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अब श्रीरामकृष्ण पंचवटी के पथ पर मास्टर, राखाल आदि के साथ बैठे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(मास्टर के प्रति)- अच्छा, बान कैसे आता है? मास्टर भूमि पर रेखाएँ खींचकर पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, माध्याकर्षण, ज्वार-भाटा, पूणिमा, अमावस्या, ग्रहण आदि समझाने की चेष्टा कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(मास्टर के प्रति)- यह लो ! समझ नहीं सक रहा हूँ । सिर घूम जाता है । चक्कर आ रहा है । अच्छा, इतनी दूर बातें कैसे जान सके ?
“देखो, मैं बचपन में चित्र अच्छी तरह खींच सकता था । परन्तु गणित से सिर चकराता था । हिसाब नहीं सीख सका ।
अब श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में लौट आए हैं । दिवार पर टँगे हुए यशोदा के चित्र को देख कह रहे हैं, “चित्र अच्छा नहीं हुआ । मानो ठीक मालिन मौसी है !”
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*अधर सेन को उपदेश*
मध्याह्न के आहार के बाद श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा सा विश्राम किया । धीरे धीरे अधर तथा अन्य भक्तगण आ पहुँचे । अधर सेन पहली बार श्रीरामकृष्ण का दर्शन कर रहे हैं । अधर का मकान कलकत्ता, बेनेटोला में है । वे डिप्टी मैजिस्ट्रेट हैं । उम्र उनतीस-तीस वर्ष की होगी ।
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अधर(श्रीरामकृष्ण के प्रति)- महाराज, मुझे एक बात पूछनी है । क्या देवता के सामने बलि चढ़ाना अच्छा है? इससे तो जीव हिंसा होती है !
श्रीरामकृष्ण- शास्त्र के अनुसार, मन की एक विशेष अवस्था में बलि चढ़ायी जा सकती है । ‘विधिवादीय” बलि में दोष नहीं है । जैसे, अष्टमी के दिन एक बलि चढ़ाते हैं । परन्तु यह विधि सभी अवस्था के लिए नहीं है । मेरी अब ऐसी अवस्था है कि मैं सामने रहकर बलि नहीं देख सकता हूँ ।
“फिर ऐसी भी अवस्था होती है कि सर्वभूतों में ईश्वर को देखता हूँ । चीटियों में भी वे ही दिखायी देते हैं । ऐसी स्थिति में एकाएक किसी प्राणी के मरने पर मन में यही सान्त्वना होती है कि उसकी देह मात्र का विनाश हुआ । आत्मा की मृत्यु नहीं है ।* न हन्यते हन्यमाने शरीरे । (गीता, २/२०)
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“अधिक विचार करना ठीक नहीं, माँ के चरणकमल में भक्ति रहने से ही हो जाएगा । अधिक विचार करने से गोलमाल हो जाता है । इस देश में तालाब का जल ऊपर ऊपर से पीओ, अच्छा साफ जल पाओगे; अधिक नीचे हाथ डालकर हिलाने से जल मैला हो जाता है । इसलिए उनसे भक्ति की प्रार्थना करो । ध्रुव की भक्ति सकाम थी, उसने राज्य पाने के लिए तपस्या की थी; परन्तु प्रह्लाद की निष्काम अहैतुकी भक्ति थी ।”
भक्त- ईश्वर कैसे प्राप्त होते हैं?
श्रीरामकृष्ण- उसी भक्ति के द्वारा । परन्तु उनसे जबरदस्ती करनी होती है । दर्शन नहीं देगा तो गले में छुरा भोंक लूँगा, - इसका नाम है भक्ति का तम ।
भक्त- क्या ईश्वर को देखा जाता है?
श्रीरामकृष्ण- हाँ, अवश्य देखा जाता है । निराकार-साकार दोनों ही देखे जाते हैं । चिन्मय साकार रूप का दर्शन होता है । फिर साकार मनुष्य रूप में भी वे प्रत्यक्ष हो सकते हैं । अवतार को देखना और ईश्वर को देखना एक ही है । ईश्वर ही युग युग में मनुष्य के रूप में अवतीर्ण होते हैं # ।
(#धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे । (गीता, ४/८)
(क्रमशः)

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