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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*इस कलि केते ह्वै गये, हिंदू मुसलमान ।*
*दादू सांची बंदगी, झूठा सब अभिमान ॥३९॥*
इस कलिकाल में हिन्दुत्व, यवनत्व का अभिमान करने वाले बहुत मनुष्य हैं । लेकिन ये लोग हिन्दुत्व यवनत्व धर्म के अभिमान से भगवान् को प्राप्त नहीं कर सकते । भगवान् तो शुद्ध भक्ति से मिलते हैं । प्रत्युत जाति वर्ण आदि का अभिमान भक्ति का बाधक है । किसी साधक ने लिखा है कि- जाति विद्या महत्वांक्षा तथा रूपयौवन का अभिमान साधक को त्याग देना चाहिये । क्योंकि ये सब भक्ति मार्ग में कांटे हैं ।
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*॥ कथनी बिना करणी ॥*
*पोथी अपना पिंड कर, हरि यश माँहीं लेख ।*
*पंडित अपना प्राण कर, दादू कथहु अलेख ॥४०॥*
केवल पुस्तकों में हरि यश लिखने मात्र से भक्ति नहीं मिलती और पंडितों से केवल कथा श्रवण से, किन्तु जब हरि के गुणानुवाद से साधक का अन्तःकरण अनुरंजित होगा तब ही भक्ति पैदा होती है । अर्थात् स्थूल सूक्ष्म शरीर जब हरि परायण हो जायेंगे तब ही हरि भक्ति समझाना चाहिये ।
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*काया कतेब बोलिए, लिख राखूं रहमान ।*
*मनवा मुल्लां बोलिये, श्रोता है सुबहान ॥४१॥*
यह मेरा शरीर ही पुस्तक है । जिसमें मैं दिन रात श्री हरि के यश को लिखता हूं और मेरा मन ही पण्डित है । जो हरि यश को गाता रहता है श्री हरि ही श्रोता है । इस प्रकार मेरा सारा शरीर ही हरिमय बन गया ।
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*दादू काया महल में नमाज गुजारूं, तहँ और न आवन पावै ।*
*मन मणके कर तसबीह फेरूं, तब साहिब के मन भावै ॥४२॥*
यह मेरा शरीर ही हरिमन्दिर है । जिसमें मैं एकान्त में बैठ कर मन रूपी माला से हरि का स्मरण करता हूँ । ऐसी उपासना ही हरि को तथा मुझे प्रिय है । वहां पर कोई जा ही नहीं सकता, जिससे कोई विघ्न हो ।
(क्रमशः)

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