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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग टोडी(तोडी) १६ (गायन समय दिन ६ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२७७ - मकरन्द ताल
नेटि१ रे माटी में मिलना,
मोड़ मोड़ देह काहे को चलना॥टेक॥
काहे को अपना मन डुलावै,
यहु तन अपना नीका धरना ।
कोटि वर्ष तूँ काहे न जीवै,
विचार देख आगैं है मरना ॥१॥
काहे न अपनी बाट संवारै,
सँयम रहना सुमिरण करणा ।
गहिला ! दादू गर्व न कीजे,
यहु सँसार पँच दिन भरणा ॥२॥
अरे ! यह देह सत्य नहीं है, अन्त - में१ इसे मिट्टी में मिलना है, फिर घमँड से इसे मोड़ - मोड़ कर क्यों चलता है ? अपने मन को विषय प्राप्ति के लिए क्यों चँचल कर रहा है ?
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यह अपना शरीर अच्छी प्रकार सदाचार में ही रखना चाहिये । तू कोटि वर्ष तक जीवे तो भी विचार करके देख, आगे मरना ही होगा । क्यों नहीं अपने कल्याण का मार्ग सुधारता ? तुझे सँयम से रहते हुये हरि स्मरण करना चाहिए ।
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अरे ! तू विषयों से पागल होकर गर्व मत करे, यह सँसार - यात्रा तुझे पाँच दिन में ही पूरी करनी है अर्थात् सात वार में एक जन्म का और एक मरण का चला जाता है, पाँच दिन ही जीवन के शेष रहते हैं । अत: तुझे शीघ्रातिशीघ्र कल्याण का साधन करना चाहिए ।
(क्रमशः)

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