शनिवार, 2 मई 2020

= *संयम कसौटी का अंग ११६(२९/३२)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*खरी कसौटी कीजिये, वाणी बधती जाइ ।*
*दादू साचा परखिये, महँगे मोल बिकाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*संयम कसौटी का अंग ११६*
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आतम उग्रहै१ चंद ज्यों, काया कलंक न जाय ।
जन रज्जब यूं आयु लग, निर्मल नाम कहाय ॥२९॥
चन्द्रमा ग्रहण से मुक्त१ हो जाता है किन्तु उसका कलंक नहीं जाता, वैसे ही जीवात्मा दुख से मुक्त हो जाता है किन्तु उसके शरीर का दोष नष्ट नहीं होता । इस प्रकार विचार करके आयु समाप्ति तक निर्मल नाम का चिन्तन करते रहना चाहिये ।
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दुख करि दुनियां देखिये, दुख करि मिले सुदीन१ ।
जन रज्जब सुख दुख परे, ताकि२ तपा३ वश कीन ॥३०॥
भ्रमण - प्रतिकूलतादि दु:खों को सहन करने से ही संसार के स्थान विशेषादि, देखे जाते हैं । सुधर्म१ की प्राप्ति भी संयमादि दु:ख सहन करने से ही होती है देखो२, संसारिक सुख-दुख से परे प्रभु को भी तपस्वी३ तप रूप कष्ट से ही अपने अनुकूल करते हैं ।
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दुख करि माया पाइये, दुख करि ब्रह्म दयाल ।
तो रज्जब दोन्यों दशा, दुख दीसे प्रतिपाल ॥३१॥
व्यापारादि के कष्ट उठाने से ही माया मिलती है । साधन रूप कष्ट भोगने पर ही ब्रह्म दयालु होते हैं । तब तक दोनों ही अवस्थाओं में दु:ख ही प्रतिपालक भासता है ।
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मेला माया ब्रह्म का, दुख दीसे निज दास ।
तो रज्जब सुणि सु:ख की, मन हि न कीजे आश ॥३२॥
माया और ब्रह्म के मिलने से दु:ख ही निजी सेवक दीखता है तब वह सुनकर सुख की आशा मन से भी नहीं करनी चाहिये ।
(क्रमशः)

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