मंगलवार, 19 मई 2020

*१४४. श्री प्रकाशानन्द जी का आत्मसमर्पण*

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*दादू तिस सरवर के तीर,*
*चरण कमल चित लाइया ।*
*तहँ आदि निरंजन पीव, भाग हमारे आइया ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४४. श्री प्रकाशानन्द जी का आत्मसमर्पण*
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भ्रातस्तिष्‍ठ तले तले विटपिनां ग्रामेषु भिक्षामट
स्‍वच्‍छन्‍दं पिब यामुनं जलमलं चीराणि कन्‍थां कुरु।
सम्‍मानं कलयातिघोरगरलं नीचापमानं सुधां
श्री राधामुरलीधरौ भज सखे वृन्‍दावनं मा त्‍यज॥[१]
([१] हे भैया ! बताऊँ कैसा जीवन तुम्‍हें बिताना चाहिये? अच्‍छा तो सुनो 'देखो' व्रज की पुण्‍य भूमि में किसी वृक्ष के नीचे पड़ रहो और भूख लगे तो आस पास के गांवों में से जाकर टुकड़े मांग लाओ। किसी ने सम्‍मान से भोजन करा दिया या और किसी भाँति से प्रतिष्‍ठा की तो उसे भयंकर विष के समान समझो। यदि गांव के मूर्ख आकर तुम्‍हें देखकर हंसें और आपमान करें तो समझना ये हमें अमृत पिला रहे हैं। पीने के लिये श्‍याम रंग वाला सुन्‍दर स्‍वच्‍छ यमुना जी का जल और ओढ़ने के लिये रास्‍ते में पड़े हुए चिथड़ों की गुदड़ी, इससे अधिक संग्रह ठीक नहीं। बस, श्री राधारमण बांके विहारी मुरलीधर का ध्‍यान करते हुए वृन्‍दावन को छोड़कर अन्‍यत्र कहीं भी मत जाओ।')
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भक्‍त चित्‍तचोर श्री गौरांग ने अद्वैत वेदान्‍त के प्रकाण्‍ड पण्डित श्री प्रकाशानन्‍द जी का मन हठात अपनी ओर आकर्षित कर लिया। वे अनजान भोले मनुष्‍य की भाँति प्रभु के मन से चरण किंकर बन गये, क्‍योंकि वे प्रभु के अपने निजजन थे। प्रभु के चले जाने पर प्रकाशानन्‍द जी अपने मठ में पहुँचे। वहाँ उन्‍हें कुछ भी अच्‍छा नहीं लगने लगा। वेदान्‍त के ग्रन्‍थ उन्‍हें काटने को दौड़ने लगे।
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उनका चित्त अब श्री चैतन्‍य चरणों के चिन्‍तन में ही सुख का अनुभव करने लगा। महाप्रभु की मनोहर मूर्ति उनके हृदय में गड़-सी गयी। वे उसकी अनुपम रुपमाधुरी का मन-ही-मन रसास्‍वादन करने लगा। उन्‍हें अपने पूर्वकृत अपराधों के लिये घोर सन्‍ताप होने लगा- 'हाय, जो इतने सरल हैं, ऐसे विनम्र हैं, इतने सुन्‍दर हैं- उनके रोम-रोम से प्रेम का प्रवाह फूट-फूटकर निकलता रहता है। सरलता की तो साक्षात साकार सजीव मूर्ति ही हैं।'
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श्रीमत्‍प्रकाशानन्‍द जी ऐसा सोच ही रहे थे कि उसी समय महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन वहाँ आ उपस्थित हुए। वे स्‍वामी प्रकाशानन्‍द जी को प्रणाम करके बैठ गये और थोड़ी देर पश्‍चात धीरे-धीरे पूछने लगे- 'भगवन ! आपने उन बंगाली स्‍वामी जी के दर्शन किये। अब तो आपने प्रत्‍यक्ष ही देख लिया कि उनका शरीर ही प्रेममय है।'

इतना सुनते ही प्रकाशानन्‍द जी ने उनके पैर पकड़ लिये और रोते-रोते कहने लगे- 'भैया ! तुमने मेरा उद्धार करा दिया। अभिमान के वशीभूत होकर अपने को पण्डित समझने वाले मुझ पतित ने उन महापुरुष की न जाने कितनी बार निन्‍दा की। वे तो साक्षात ईश्‍वर हैं। शरीर धारी नारायण हैं। उन्‍होंने जो बातें कहीं सो सभी सत्‍य हैं।'
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अपने पैरों को जल्‍दी खींचते हुए उन महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन ने प्रकाशानन्‍द जी से कहा- भगवन ! आप यह मुझ पर कैसा अपराध चढ़ा रहे हैं? मेरे लिये तो आप भी साक्षात शंकर हैं। आपको क्‍या ज्ञान और क्‍या अज्ञान? आप तो सर्वज्ञ हैं। लोक शिक्षण के लिये और भक्ति का माहात्‍म्‍य प्रकट करने के लिये ही आपने ऐसा किया।
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आपने जीवन में इस बात को प्रत्‍यक्ष करके दिखा दिया कि कितना भी भारी ज्ञानी क्‍यों न हो उसे उन अरविन्‍दाक्ष भगवान श्री हरि का आश्रय कभी न छोड़ना चाहिये। जो ज्ञान अभिमान में अच्‍युत का आश्रय त्‍याग देते हैं उनका अवश्‍य ही अध: पतन हो जाता है। आपने तो अपने जीवन से भक्ति का माहात्‍म्‍य प्रकट किया है। भगवन ! आपके चरणों में मेरा कोटि-कोट प्रणाम है। मैं तो आपको बहुत ही श्रेष्‍ठ समझता हूँ।'

इस प्रकार बहुत देर तक बातें होती रहीं। महाराष्‍ट्रीय सज्‍जन स्‍वामी जी से विदा लेकर अपने घर चले गये। दूसरे दिन इस सुखद संवाद को सुनाने के लिये प्रभु के पास आ रहे थे कि उन्‍हें रास्‍तें में ही गंगा स्‍नान करके लौटते हुए प्रभु मिल गये।
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जल्‍दी में उन्‍होंने प्रणाम करके कहा- 'प्रभो ! 'प्रभो ! महान आश्‍चर्य की बात ! आपकी माया अपार है 'प्रभो ! ओहो ! जो आपकी इतनी भारी निन्‍दा किया करते थे; वे वेदान्‍त-शिरोमणि श्री मत्‍प्रकाशानन्‍द अब बालकों की भाँति रो रहे हैं। अब उन्‍हें वेदान्‍त चिन्‍तन, शास्‍त्रों का पठन-पाठन कुछ भी नहीं भाता है, अब वे निरन्‍तर श्री चैतन्‍यचरणों का ही चिन्‍तन करते हैं।'
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इस संवाद को सुनते ही प्रभु उछलने लगे और परम प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहने लगे- 'भगवान बड़े दयालु हैं, उन्‍होंने पूज्‍यपाद प्रकाशानन्‍द जी के ऊपर कृपा कर दी। उन्‍हें प्रेमदान देकर अपना लिया। अहा ! उन महापुरुष के चरणों की धूलिको मैं अपने मस्तक पर चढ़ाकर अपने जीवन को कृतार्थ करूँगा।
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'इतना कहते-कहते प्रभु बिन्‍दुमाधव जी के मन्दिर में दर्शन करने गये। भगवान की मनोहर मूर्ति के दर्शनों से प्रभु भावावेश में आकर नृत्‍य करने लगे। श्री सनातन, चन्‍द्रशेखर वैद्य, तपन मिश्र आदि भक्‍त भी प्रभु के साथ ताली बजा-बजाकर नाचने और-
हरिहरये नम: कृष्‍णयादवाय नम:।
गोपाल गोविन्‍द राम श्रीमधुसूदन॥
-इस पद को बड़े ही स्‍वर के साथ गाने लगे। महाप्रभु ब्रह्मज्ञान शून्‍य होकर नृत्‍य कर रहे थे। बहुत-से दर्शनार्थी प्रभु का नृत्‍य देखनेके लिये एकत्रित हो गये।
(क्रमशः)

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