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*दादू निरखि निरखि निज नाम ले,*
*निरखि निरखि रस पीव ।*
*निरखि निरखि पिव कौं मिलै,*
*निरखि निरखि सुख जीव ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४४. श्री प्रकाशानन्द जी का आत्मसमर्पण*
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संकीर्तन की सुमधुर ध्वनि सुनकर शिष्यों के सहित श्री स्वामी प्रकाशानन्द जी भी वहाँ आ उपस्थित हुए और वे भी प्रभु के स्वर में स्वर मिलाकर-
हरिहरये नम: कृष्णयादवाय नम:।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन॥
-इस पद गायन करने लगे।
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थोड़ी देर के अनन्तर प्रभु ने संकीर्तन बंद कर दिया। उन्हें अब कुछ बाह्य ज्ञान हुआ। सामने सशिष्य प्रकाशानन्द जी को देखकर प्रभु ने उनके चरणों में भक्तिभाव से प्रणाम किया। इस पर प्रकाशानन्द जी प्रभु के पैरों में पड़ गये। अपने पैरों को जोर से खींचते हुए प्रभु दीनभाव से कहने लगे- 'भवगन ! यह आप कैसा अनर्थ कर रहे हैं।
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गुरुजन होकर आप मेरे ऊपर पाप क्यों चढ़ा रहे हैं? मैं तो आपके शिष्यों के शिष्यों तक के बराबर नहीं हूँ, यद्यपि आपकी दृष्टि में सभी ब्रह्मस्वरूप हैं, फिर भी लोकमर्यादा के हिसाब से आपको ऐसा न करना चाहिेये। आप तो मेरे परम वन्दनीय हैं।'
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धीरे-धीरे प्रकाशानन्द जी ने कहा- 'प्रभो ! मैं अपने पूर्वकृत पापों का प्रायश्चित कर रहा हूँ। मैंने आपकी लोंगों के सामने बहुत निन्दा की थी। 'प्रभु ने कानों पर हाथ रखते हुए कहा- 'श्री हरि श्री हरि ! आप कैसी बातें कर रहे हैं? गुरुजन अपने शिष्य तथा सेवकों की कभी बुराई कर ही नहीं सकते। वे तो सदा उनके कल्याण की ही बातें सोचा करते हैं। आप भला मेरी कभी बुराई कर सकते हैं?'
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इस प्रकार बहुत देर तक दोनों महापुरुषों के बीच बातें होती रहीं। अन्त में दोनों ही एक-दूसरें से विदा हुए। सांयकाल के समय एकान्त में श्री प्रकाशानन्द जी महाप्रभु के पास स्वयं आये। आते ही उन्होंने प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया और एक साधारण शिष्य की भाँति नम्रता से एक ओर बैठ गये। प्रभु ने इनका जोरों से आलिंगन किया और खीचकर आपने समीप बैठ लिया।
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तब प्रकाशानन्द जी ने दोनो हाथों की अंजलि बांधे हुए बड़ी ही नम्रता के साथ कहा- 'प्रभो ! मैंने अब तक अपना अमूल्य समय अभिमान और आत्मश्लाघा में ही बिता दिया। परमार्थपथ से मैं अब तक एक दम अनभिज्ञ ही रहा, इसलिये अब मुझे क्या करना चाहिये, मेरा मुख्य कर्तव्य क्या है, सो बता दीजिये।'
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प्रभु ने कहा- 'भगवन ! आप साधारण जीव नहीं हैं। आप तो जीवन्मुक्त हैं। आप जो भी कुछ करना चाहते हैं और आप जो भी कुछ करेंगे उसका एक मात्र उद्देश्य लोक संग्रह और लोक शिक्षण ही होगा। इसलिये भगवन ! मैं तो यही समझता हूँ कि प्राणि मात्र का परम पुरुषार्थ श्रीकृष्ण प्रेम की उपलब्धि करना ही है। प्रभु के पादपद्मों में प्रीति हो- यही सब साधनों का अन्तिम फल है और सभी कार्य इसी एक उद्देश्य की पूर्ति के निमित्त करने चाहिये।'
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प्रकाशानन्द जी ने पूछा- 'प्रभो ! प्रभु पादपद्मों में प्रेम कैसे हो?' प्रभु ने कहा- 'सजातीय और विजातीय दो पदार्थ हैं। जीव भगवान का अंश है, यदि इसे सजातीय भगवान की ओर लगायेंगे तो आनन्द की उपलब्धि होगी और विजातीय संसारी कामों में फंसाये रखेंगे तो यह सदा दु:खी ही बना रहेगा। इसलिये अनन्य भाव से उन्हीं प्रभु की शरण जाने में कल्याण है, यही प्रेम प्राप्ति का सर्वोत्तम उपाय है।'
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प्रकाशानन्द जी ने कहा- 'प्रभो ! शास्त्रों का सिद्धान्त हैं, द्वितीयाद वै भयं भवति' अर्थात दूसरे से तो सदा भय ही होता है, इसका क्या अभिप्राय है? जब तक सेव्य-सेवक-भाव है, तब तक द्वैत है और द्वैत भय का कारण है, फिर किस भाव से शरण में जाऊँ?'
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प्रभु ने कहा- 'भगवन ! आप ध्यान पूर्वक इस बात पर विचार करें। वास्तव में यह बात ठीक है कि द्वैत में सदा भय ही होता है। बिना अद्वैतभावना के शान्ति नहीं, किन्तु आप सोचिये- आंश में और अंशी में, सेव्य में और सेवक में, सखा और सखा में, पिता में और पुत्र में तथा पतिे में और पत्नी में क्या द्वैधीभाव रहता है?
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जहाँ द्वैत है वहाँ प्रेम कहाँ? प्रेम तो एक होने पर ही होता है। जिसे हम अपना कहकर स्वीकार कर चुके है। दूसरा रह ही नहीं जाता। व्यवहार में भी देखा जाता है, जब कोई गुप्त बात कहनी होती है, तो कहने वाला पास में बैठे हुए आदमियों की ओर शंकित दृष्टि देखता है। तब सुनने वाला कहता है- 'तुम निश्चिन्त होकर कहो, यहाँ कोई 'दूसरा' नहीं हैं। अर्थात सभी अपने हैं।'
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इसलिये अपनापन स्थापित हो जाने पर फिर भय का क्या काम? फिर तो दिन दूना आनन्द ही बढ़ता जाता है। सम्बन्ध पाँच ही प्रकार से हो सकता है- अशं-अंशी-सम्बन्ध, स्वामी-सेवक-सम्बन्ध, सख्त-सम्बन्ध, पिता-पुत्र का सम्बन्ध और पति-पत्नी का सम्बन्ध। इन्हें ही क्रम से शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और कान्ताभाव कहते हैं।
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इनमें से भगवान के साथ कोई भी सम्बन्ध स्थापित हो जाने पर फिर वे दूसरे नहीं रहते। अपने ही हो जाते हैं, द्वैत न रहकर अद्वैत बन जाते हैं। शान्तभाव में ऐश्वर्य की भावना रहने से कुछ अद्वैत का अंश शेष रह जाता है। दास्यभाव में निरन्तर सेवक की भावना रखने से शांत की अपेक्षा कुछ द्वैतभाव कम हो जाता है, शख्य दास की अपेक्षा कुछ कम हो जाता है, किन्तु कुछ द्वैत तो सख्य में भी बना ही रहता है।
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सखा अपने सखा से यह इच्छा तो रखता ही है कि यह भी हमसे स्नहे करें। सख्य की अपेक्षा वात्सल्य भाव में द्वैत बहुत ही कम हो जाता है। क्योंकि असली पिता अपने में और पुत्र में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं समझता। पुत्र पिता का आत्मा ही है। किन्तु फिर भी द्वैधी भाव समूल नष्ट नहीं होता। लालन-पालन जन्य कुछ सूक्ष्म द्वैतांश शेष रह ही जाता है।
(क्रमशः)

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