शुक्रवार, 5 जून 2020

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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर कुछ नांहि ।*
*ज्यों पाला पाणी कों मिल्या, त्यों हरिजन हरि मांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु*, *पति भक्ति*
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विष्णुचित्त की पुत्री आण्डाल श्री रंगनाथजी को पति भाव से भजती थी । उसकी प्रीति देख करके रंगनाथजी ने मंदिर के अधिकारियों से कहा - "मेरी प्रियतमा आण्डाल को मेरे पास ले आओ ।" उधर विष्णुचित्त को भी स्वप्न में कहा - 'तुम आण्डाल को मेरे पास लाओ, मैं उसका पाणिग्रहण करूंगा ।' मंदिर के अधिकारी लोग बड़ी धूम धाम से अण्डाल को ले आये । 
वह मंदिर में प्रवेश करके तुरन्त भगवान की शेष शय्या पर चढ गई । तत्काल एक दिव्य प्रकाश फैल गया । सबके देखते देखते आण्डाल बिजली के समान चमक कर विलीन हो गई । प्रेमी और प्रेमास्पद एक हो गये । इससे सूचित होता है कि पति भाव के भक्त नारी का भगवान पाणिग्रहण भी करते हैं ।
सुपति भाव के भक्त का, ग्रहण करत हरि हाथ ।
करत भये आण्डाल से, विवाह श्री रंगनाथ ॥२८०॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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