शुक्रवार, 5 जून 2020

*प्यासे चातक की तरह पुकारो*

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*जिहि लागी सो जागि है, बेध्या करै पुकार ।* 
*दादू पिंजर पीड़ है, सालै बारम्बार ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग)* 
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
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परिच्छेद २८ 
*नरेन्द्र आदि भक्तों के साथ बलराम के मकान पर* 
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बलराम बाबू के मकान में बैठे हुए हैं, बैठक के उत्तरपूर्ववाले कमरे में । दोपहर ढल चुकी, एक बजा होगा । नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल, बलराम और मास्टर कमरे में उनके साथ बैठे हुए हैं ।
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आज अमावस्या है, शनिवार, ७ अप्रैल १८८३ । श्रीरामकृष्ण बलराम बाबू के घर सुबह को आए थे । दोपहर का भोजन वहीँ किया है । नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल तथा और भी दो-एक भक्तों को आपने निमन्त्रित करने के लिए कहा था, अतएव उन लोगों ने भी यहीं आकर भोजन किया है । श्रीरामकृष्ण बलराम से कहते थे- “इन्हें खिलाना, तो बहुत से साधुओं को खिलाने का पुण्य होगा ।”
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कुछ दिन हुए श्रीरामकृष्ण श्री केशवबाबू के यहाँ ‘नववृन्दावन’ नाटक देखने गए थे । साथ नरेन्द्र और राखाल भी गए थे । नरेन्द्र ने भी अभिनय में भाग लिया था । केशव पवहारी बाबा बने थे ।
श्रीरामकृष्ण(नरेन्द्रादि भक्तों से)- केशव साधु बनकर शान्तिजल छिड़कने लगा । परन्तु मुझे अच्छा न लगा । अभिनय में शान्तिजल !
“और एक आदमी(कु. बाबू) पापपुरुष बना था । ऐसा करना भी अच्छा नहीं । न पाप करना ही अच्छा है और न पाप का अभिनय करना ही । 
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नरेन्द्र का स्वास्थ्य अच्छा नहीं हैं; परन्तु उनका गाना सुनने की श्रीरामकृष्ण को बड़ी इच्छा है । वे कहने लगे, “नरेन्द्र, ये लोग कह रहे हैं, तू कुछ गा ।”
नरेन्द्र तानपुरा लेकर गाने लगे । गीतों का भावार्थ यह है-
(१) “मेरे प्राण-पिंजरे के पक्षी, गाओ । ब्रह्म-कल्पतरु पर बैठकर परमात्मा के गुण गाओ ! धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-रूपी पके हुए फल खाओ । हे मेरे हृदय के प्राणविहंग, तुम निरन्तर ‘आत्माराम, प्राणाराम’ कहकर पुकारो । प्यासे चातक की तरह पुकारो, आलस मत करो ।”
(२) “वे विश्वरंजन हैं, परमज्योति ब्रह्म हैं, अनादिदेव जगत्पति हैं, प्राणों के भी प्राण हैं ।....”
(३) “हे राजराजेश्वरी ! दर्शन दो ! मैं जिन प्राणों को तुम्हारे चरणों में अर्पित कर रहा हूँ, वे संसार के अनल-कुण्ड में पड़कर झुलस गए हैं । और उस पर यह हृदय कलुष-कलंक से आवृत है । दयामय ! मोहमुग्ध होकर मैं मृतकल्प हो रहा हूँ, तुम मृतसंजीवनी दृष्टि से मेरा शोधन कर लो ।”
(४) “गगनरूपी थाल में रवि-चन्द्ररुपी दीपक जल रहे हैं ।.......”
(५) “चिदाकाश में प्रेमचन्द्र का पूर्ण उदय हुआ ।......”
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नरेन्द्रनाथ के गानों के समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण ने भवनाथ से गाने के लिए कहा । भवनाथ ने भी एक गाना गाया ।
(भावार्थ)- “हे दयाधन, तुम्हारे जैसा हितकारी और कौन है? इस प्रकार सुख और दुःख में समान रूप से साथ देनेवाला । सभी पाप-ताप, भय आदि का हरण करनेवाला साथी दूसरा कौन है? संकटों से पूर्ण इस घोर भवसागर से तारनेवाला खेवैया और कौन हैं? किसकी कृपा से ये संग्रामकारी रिपुगण पराजित होकर दूर भागते हैं? इस प्रकार समस्त पापों का दहन और त्रिताप का निवारण कर शान्तिजल प्रदान करनेवाला और कौन है? अन्त समय में, जब सभी त्याग देते हैं उस समय, कौन इस तरह बाँहें फैलाकर गोद में ले लेता है?”
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नरेन्द्र(हँसते हुए)- इसने(भवनाथ ने) पान और मछली खाना छोड़ दिया है । 
श्रीरामकृष्ण(भवनाथ से हँसते हुए)- क्यों रे? पान और मछली में क्या रखा है? इससे कुछ नहीं होता । कामिनी-कांचन का त्याग ही त्याग है । राखाल कहा है?
एक भक्त- जी, राखाल सो रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(हँसते हुए)- एक आदमी बगल में चटाई लेकर नाटक देखने के लिए गया था । नाटक शुरू होने में देर थी, इसलिए वह चटाई बिछाकर सो गया । जब जागा तब सब समाप्त हो गया था ! (सब हँसते हैं ।)
“फिर चटाई बगल में दबाकर घर लौट आया ।”
रामदयाल बहुत बीमार हैं । एक दूसरे कमरे में, बिछौने पर पड़े हैं । श्रीरामकृष्ण उस कमरे में जाकर उनकी बीमारी का हाल पूछने लगे ।
(क्रमशः)

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