गुरुवार, 4 जून 2020

*समाधितत्त्व-सविकल्प और निर्विकल्प*

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*ब्रह्म भक्ति जब उपजै, तब माया भक्ति बिलाइ ।* 
*दादू निर्मल मल गया, ज्यूँ रवि तिमिर नसाइ ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)* 
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
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*केशव के घर जाना और नववृन्दावन-दर्शन*
“यहाँ तक कि जो लोग सच्चे हैं उनके लिए कौतुकवश भी झूठ की नक़ल बुरी चीज है । केशव सेन के यहाँ मैं ‘नववृन्दावन’ नाटक देखने गया था । न जाने कैसा क्रास(Cross) वह लाया और फिर पानी छिड़कने लगा; कहता था, शान्तिजल है । एक को देखा, मतवाला बना बहक रहा था ।
ब्राह्मभक्त- कु. बाबू थे ।
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श्रीरामकृष्ण- भक्त के लिए इस तरह का स्वाँग करना भी अच्छा नहीं । उन सब विषयों में बड़ी देर तक मन को डाल रखना दोष है । मन धोबी के घर का कपड़ा है, जिस रंग से रंगोगे, वही रंग उस पर चढ़ जाएगा । मिथ्या में बड़ी देर तक डाल रखोगे तो मिथ्या ही हो जाएगा ।
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“एक दूसरे दिन ‘निमाई-संन्यास’ का अभिनय था । केशव के घर में मैं भी देखने के लिए गया था । केशव के कुछ खुशामदी चेलों ने अभिनय बिगाड़ डाला था । एक ने केशव से कहा, ‘कलिकाल के चैतन्य तो आप ही हैं’ । केशव मेरी ओर देखकर हँसता हुआ कहने लगा, ‘तो फिर ये क्या हुए?’ मैंने कहा, ‘मैं तुम्हारे दासों का दास-रज की रज हूँ ।’ केशव को नाम और यश की अभिलाषा थी !”
“नित्यसिद्धों का एक दर्जा ही अलग है । सभी चिड़ियों की चोंच टेढ़ी नहीं होती । ये कभी संसार में नहीं फँसते, जैसे प्रह्लाद ।
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“साधारण मनुष्य साधना करता है, ईश्वर पर भक्ति भी करता है, और संसार में भी फँस जाता है, स्त्री और धन के लिए भी हाथ लपकाता है । मक्खी जैसे फूल पर भी बैठती है, बर्फियों पर भी बैठती है और विष्ठा पर भी बैठती है । (सब स्तब्ध हैं ।)
“नित्यसिद्ध तो मधुमक्खी की तरह होते हैं । मधुमक्खियाँ केवल फूल पर बैठती हैं और मधु ही पीती हैं । नित्यसिद्ध रामरस का ही पान करते हैं, विषयरस की ओर नहीं जाते ।
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“साधना द्वारा जो भक्ति प्राप्त होती है, इनकी वह भक्ति नहीं है । इतना जप, इतना ध्यान करना होगा, इस तरह पूजा करनी होगी, यह सब विधिवादीय भक्ति है । जैसे किसी गाँव में किसी को जाना है, परन्तु रास्ते में धनहे खेत पड़ते हैं, तो मेड़ों से घूमकर उसे जाना पड़ता है । अगर किसी को सामनेवाले गाँव में जाना हैं, परन्तु रास्ते में नदी पड़ती है, तो टेढ़ा रास्ता चक्कर लगाते हुए ही पार करना पड़ता है ।
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“रागभक्ति, प्रेमाभक्ति, ईश्वर पर आत्मीयों की-सी प्रीति होने पर फिर कोई विधिनियम नहीं रह जाता । तब का जाना धनहे खेतों की मेड़ों पर का जाना नहीं, किन्तु कटे हुए खेतों से सीधा निकल जाना है । चाहे जिस ओर से सीधे चले जाओ । बाढ़ आने पर फिर नदी के टेढ़े रास्ते से नहीं जाना पड़ता । तब इधर उधर की जमीन और रास्ते पर एक बाँस पानी चढ़ जाता है । तब तो बस सीधे नाव चलाकर पार हो जाओ । “इस रागभक्ति, अनुराग या प्रेम के बिना ईश्वर नहीं मिलते ।”
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*समाधितत्त्व-सविकल्प और निर्विकल्प*
अमृत- महाराज ! इस समाधि-अवस्था में भला आपको क्या जान पड़ता है?
श्रीरामकृष्ण- सुना नहीं? भौंरे की चिन्ता करते करते झींगुर भौंरा ही बन जाता है । वह अनुभव कैसा होता है जानते हो? मानो हण्डी की मछली को गंगा में छोड़ दिया हो । 
अमृत- क्या जरा भी अहंकार नहीं रह जाता?
श्रीरामकृष्ण- हाँ, बहुधा मेरा कुछ अहंकार रह जाता है । सोने के एक टुकड़े को तुम चाहे जितना घिस डालो पर अन्त में एक छोटा सा कण बचा ही रहता है । और, जैसे कोई बड़ी भारी अग्निराशी है, उसकी एक जरा सी चिनगारी हो । बाह्य ज्ञान चला जाता है, परन्तु प्रायः थोड़ासा अहंकार रह जाता है, शायद वे विलास के लिए रख छोड़ते हैं । ‘मैं’ और ‘तुम’ इन दोनों के रहने ही से स्वाद मिलता है । कभी कभी इस ‘अहं’ को भी वे मिटा देते हैं । इसे ‘जड़ समाधि’ या ‘निर्विकल्प समाधि’ कहते हैं । तब क्या अवस्था होती है, यह कहा नहीं जा सकता ! नमक का पुतला समुद्र नापने गया था । ज्योंही समुद्र में उतरा कि गल गया । ‘तदाकाराकारित’ ! अब लौटकर कौन बतलाये कि समुद्र कितना गहरा है !
(क्रमशः)

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