गुरुवार, 4 जून 2020

साच का अंग ६६/७०

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*सो उपज किस काम की, जे जण जण करै कलेश ।* 
*साखी सुन समझै साधु की, ज्यों रसना रस शेष ॥६६॥* 
जिस ज्ञान से विवाद पैदा होता है ऐसा ज्ञान ज्ञान नहीं कहलाता । किन्तु वह तो विवाद को बढाने के लिये ही है । उससे मन में अभिमान पैदा होता है । 
लिखा है कि- सत्पुरुषों का ज्ञान मद मान आदि का नाशक होता है और अज्ञानियों के लिये वही ज्ञान मद और मान को बढ़ाने वाला होता है । वास्तविक ज्ञान तो वही है कि जो भगवत चिन्तन में शेष की तरह रसास्वाद को पैदा करे और अहंकार की ग्रन्थि को नष्ट करे । 
वेदान्तसंदर्भ में कहा है कि- हे साधक ! तुम सावधान होकर समाधि लगाता हुआ अपने हृदय में जो अभिमान की ग्रन्थि है, उसको जला डाल तथा ब्रह्मानन्द अमृत के समुद्र में डूबता हुआ खेलता हुआ आनन्द लेता हुआ संसार में रमण करो । 
*दादू पद जोड़ै साखी कहै, विषय न छाड़ै जीव ।* 
*पानी घालि बिलोइये तो, क्यों करि निकसै घीव ॥६७॥* 
चित्त से विषयों की व्यावृत्ति के बिना केवल श्लोक रचना प्रवचन करना यह ऐसे ही निष्फल है जैसे जल का मन्थन । क्योंकि जल के मन्थन से घृत नहीं मिल सकता, ऐसे ही विषयों की व्यावृत्ति के बिना आत्म ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता । 
वेदान्तसंदर्भ में- यह दृश्य मात्र जगत् सब मिथ्या है ऐसा जिसको ज्ञान हो गया, उसके चित्त में यह वह आदि का स्फुरण ही नहीं होता । वह जीवन्मुक्त हो जाता है । अतः साधक को चित्त शुद्धि के लिये यत्न करना चाहिये । 
*दादू पद जोड़े का पाइये, साखी कहे का होइ ।* 
*सत्य शिरोमणि सांइयां, तत्त न चीन्हा सोइ ॥६८॥* 
सच्चिदानन्द ब्रह्म का अनुभवपर्यन्त ज्ञान के बिना शास्त्रों की व्याख्यान श्रवण और कथन केवल द्रव्य उपार्जन करने का साधन ही है, मुक्ति का नहीं । 
*कहबा सुनबा मन खुशी, करबा औरै खेल ।* 
*बातों तिमिर न भाजई, दीवा बाती तेल ॥६९॥* 
जैसे केवल दीपक के गुण ज्ञान के अन्धकार की निवृत्ति नहीं हो सकती जब तक उसमें तेल बाती डाल कर जलाओगे नहीं । ऐसे ही शास्त्र श्रवण तत्कथन भी मनोविनोद ही है ज्ञान के लिये नहीं । ज्ञान के साधनों का अनुष्ठान भी शास्त्र श्रवण के साथ करना चाहिये । अन्यथा सब निष्फल ही है । 
*दादू करबे वाले हम नहीं, कहबे को हम शूर ।* 
*कहबा हम थैं निकट है, करबा हम थैं दूर ॥७०॥* 
अनुभवशून्य ज्ञान के वक्ता ज्ञान का व्याख्यान देने में ही शूरवीर हैं, तदनुसार कर्तव्य के करने में नहीं । 
(क्रमशः)

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