रविवार, 7 जून 2020

= *साँच चाणक का अंग १२१(९/१२)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहीं जाइ ।*
*उत्तम मध्यम वासना, भला बुरा सब खाइ ॥*
===================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*साँच चाणक का अंग १२१*
.
मन भुवंग१ शिर शब्द मणि, विषय सु विष नहिं जाहि ।
रज्जब देखि उजास२ वहिं३, मारि मारि जिव खाहि ॥९॥
सर्प१ के मस्तक में मणि रहती है किन्तु उस सर्प का विष दूर नहीं होता, उस मणि के प्रकाश२ से ही वह३ मच्छरों को मार मारकर खाता है । वैसे ही मन में ज्ञान पूर्ण शब्द रहते हैं किन्तु मन विषयों को नहीं त्यागता और उक्त शब्दों के ज्ञान से ही इन्द्रियों को विषयों से तृप्त करने में लगा रहता है ।
.
देही१ दर्शण२ बंध वपु३, ज्ञानी अकलि४ अगाध ।
रज्जब रस रीति हि लिये, मुश्किल हूणा५ साध ॥१०॥
शरीराध्यास३ में बंधा हुआ है, विषय-रस रीति को मन में लिये रहता है तो भी शरीर१ पर साधु भेष२ धारण करके अगाध बुद्धि४ के द्वारा ज्ञानी बन रहा है किन्तु इस प्रकार साधु होना५ कठिन है अर्थात ज्ञान वैराग्य बिना साधु बिना साधु नहीं हो सकता ।
.
रज्जब नग१ नव खंड किये, धरि सु अष्ट विधि ध्यान ।
मन मुक्ता गत२ मोल ह्वै, कहो कौन यहु ज्ञान ॥११॥
मोती१ के नौ टुकड़े करने से यह हीन२ मूल्य का हो जाता है इसी प्रकार मन से - १.मूलाधार, २.स्वाधिष्ठान, ३.मणिपूरक, ४.अनाहत, ५.विशुद्ध, ६.आज्ञा, ७.सोम, ८.गुरु, इन अष्ट चक्रों के अष्ट विधि ध्यान करने से मन भी अद्वैत ब्रह्म चिन्तन के समान मूल्य वाला नहीं रहता, तब कहो यह कौन सा ज्ञान है ? अर्थात विभिन्न चिन्तन ज्ञान नहीं होता, एक ब्रह्म चिन्तन ही ज्ञान है । यह हठ योगियों को चेतावनी है ।
.
मन१ अस्थिर करणाँ कठिन, रोकि दशों दिशि मुख्ख ।
अष्ट ध्यान धरि अष्ट मधि, इहै२ भंग३ इह४ रुख्ख५ ॥१२॥
दश इन्द्रियों रूप दशों दिशाओं के मन के मुखों को रोक कर मन को स्थिर१ करना कठिन है, अष्ट चक्रों में अष्ट प्रकार का ध्यान करना यहां२ शरीर में ही मन को ब्रह्म चिन्तन से वंचित३ करना है, इस ध्यान की यही४ चेष्टा५ है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें