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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २८४/२८६*
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आदि आलिफ अलह कह्या, है कोइ जांणै भेद ।
कहि जगजीवन काजी पंडित, पढ़ि कतेब अरु बेद ॥२८१॥
संत कहते है कोइ ही ऐसा जिसने प्रभु नाम की महिमा जानी हो ऐसे भले ही काजी पुस्तक पढे या पंडित वेद पढे वे सब व्यर्थ हैं।
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रा बिरादर बंदी म गोईद, नेकी भिस्त मुकाम ।
कहि जगजीवन अलह लहै, नूर पीवै भजि नांम ॥२८२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वह ही सच्चा भाई बंधु है जो स्मरण में साथ हो, और जीवमात्र का भला कर स्वर्ग में स्थान को अपना लक्ष्य बनाये, वह ही स्मरण से प्रभु को प्राप्त कर तेज का आनंद लेते हैं।
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रांम नांम पढ़ि पारसी, अलख अरबी नांम ।
कहि जगजीवन अलह लहै, अलह अलफि निज ठांम ॥२८३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम शब्द को चाहे पाररसी भाषा में पढे चाहे उस प्रभु को अरबी भाषा में देखें वे इन सब से परे अपने स्थान में ही हैं वे भाषा भेद से परे हैं।
(क्रमशः)

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