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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*दादू चारै चित दिया, चिन्तामणि को भूल ।*
*जन्म अमोलक जात है, बैठे माँझी फूल ॥५८॥*
हरि नाम स्मरण छोड़ कर भोजन आच्छादन मात्र में ही अपने चित को लगाते रहते हैं, उनका जीवन व्यर्थ ही चला जाता है उनकी दृष्टि में तो वे अपने जीवन को व्यर्थ नहीं मानते । प्रस्तुत अपने समाज में बैठकर भोजन आदि की बड़ी प्रशंसा करते हैं कि यह भोजन तो अमृत के समान बड़ा ही मधुर मधुर बना है । परन्तु शास्त्र दृष्टि से ऐसे प्राणियों का जीवन व्यर्थ ही है ।
श्रीमद्भागवत में- “सन्मार्ग में चलते हुए इस जीव को जिव्हा और उपास्य इन्द्रिय के भोग में लगे हुए विषयी पुरुषों का समागम हो जाय तो और वह भी उनमें आस्था करके उन्हीं का अनुगमन करने लगता है तो पहले के समान ही फिर नारकीय योनियों में पड़ता है ।”
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*भरी अधौड़ी भावठी, बैठा पेट फुलाइ ।*
*दादू शूकर स्वान ज्यों, ज्यों आवै त्यों खाइ ॥५९॥*
जो कुत्ता शूकर की तरह बार-बार मात्रा से अधिक भोजन करता है उसके आध्मानकर(पेट फूलना) आदि रोग पैदा हो जाते हैं । अतः साधक को चाहिये कि भूख के अनुसार आत्म संमित भोजन करना चाहिये । जो आलस्य को पैदा न करे । शतपथश्रुति में- जो आत्मसंवित अन्न है तथा जो बार बार नहीं खाया जाता ऐसा भोजन शरीर की रक्षा करता है । अत्यनल्प भोजन है वह भी शरीर की रक्षा नहीं करता किन्तु अत्यल्प भोजन से शरीर सूख जाता है ।
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*॥ सिसन स्वाद ॥*
*दादू खाटा मीठा खाइ करि, स्वादैं चित दीया ।*
*इन में जीव विलंबिया, हरि नाम न लीया ॥६०॥*
साधक को अति मधुर अम्ल तथा लवण आदि मिश्रित भोजन नहीं करना चाहिये । ऐसा भोजन करने से चित्त उन्हीं पदार्थों में बार बार दौड़ता है जिससे हरि स्मरण में बाधा आती है । क्योंकि रसास्वाद को समाधि का प्रतिबन्धक माना है ।
गीता में- आयु बल बुद्धि आरोग्य सुख और प्रीति बढ़ाने वाले एवं रसयुक्त चिकने और स्थिर वाले तथा स्वभाव से मन को प्रिय आहार सात्विक पुरुषों को अच्छे लगते हैं और कडुवे खट्टे और दाहकारक एवं दुःख चिन्ता को उत्पन्न करने वाले आहार तामस पुरुषों को प्रिय लगते हैं । अतः साधक को सात्विक भोजन करना चाहिये । जिससे भगवान् में चित्त लगे ।
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*भक्ति न जाणै राम की, इन्द्री के आधीन ।*
*दादू बँध्या स्वाद सौं, ताथैं नाम न लीन ॥६१॥*
इन्द्रियाधीन तथा स्वादु भोजन करने वाला व्यक्ति भगवान् की भक्ति नहीं कर सकता, अतः जितेन्द्रिय तथा भोगों को त्याग कर भक्तिनिष्ठ होकर ही भगवान् को भजना चाहिये ।
महाभारत में- अपनी बुद्धि से विचार कर सब परिग्रहों को त्याग कर तथा इन्द्रियों को जीत कर शोक रहित आत्मा के सन्मुख ध्यान करने के लिये बैठो । ऐसे अध्यात्मध्यान से साधक को इस लोक तथा परलोक में अभय पद प्राप्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

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